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Saturday, 8 February 2014

“मैं जानता था...


दो बचपन के दोस्तों ने एक साथ एक ही स्कूल में पढ़ाई की, एक ही कॉलेज गए और सेना में भी एक ही साथ भर्ती हुए. युद्ध छिड़ने पर दोनों की तैनाती भी एक ही यूनिट में हुई. एक रात उनकी यूनिट चारों और से हो रही गोलीबारी में घिर गई और उनके बहुत से साथी शहीद हो गए.

घना अँधेरा छाया था और हर तरफ से गोलियां चलने की आवाज़ आ रही थी. किसी के बोलने की दर्दभरी आवाज़ आई – “सुनील, यहाँ आओ और मेरी मदद करो”. सुनील पहचान गया कि यह उसके बचपन के दोस्त हरीश की आवाज़ थी. उसने कैप्टन से उसके पास जाने की इजाज़त मांगी.

“नहीं!” – कैप्टन ने कहा – “मैं तुम्हें वहां जाने की इजाज़त नहीं दे सकता! हमारे इतने जवान मारे जा चुके हैं और मैं किसी और को खोना नहीं चाहता! तुम हरीश को नहीं बचा सकते, वह बहुत ज़ख्मी लगता है”.

सुनील चुपचाप बैठ गया. हरीश की आवाज़ फिर से आई – “सुनील, यहाँ आओ, मेरी मदद करो”.

सुनील चुपचाप बैठा रहा क्योंकि कैप्टन उसे जाने को मना कर चुका था. हरीश की दर्द भरी पुकार बार-बार आती रही. अंततः सुनील खुद को नहीं रोक सका. उसने कैप्टन से कहा – “कैप्टन, हरीश मेरे बचपन का दोस्त है. मैं उसकी मदद ज़रूर करूँगा”. कैप्टन ने अनिच्छापूर्वक उसे जाने दिया.

सुनील अँधेरे में खंदकों से गुज़रता हुआ हरीश तक पहुंचा और उसे अपनी खंदक में ले आया. कैप्टन ने जब यह देखा कि हरीश मर चुका है तो उसे सुनील पर बहुत गुस्सा आया और वह उसपर चिल्लाया – “मैंने तुम्हें वहां जाने को मना किया था ना! वो मर चुका था और उसके साथ तुम भी मारे जाते और यहाँ कोई नहीं बचता! तुमने कितनी बड़ी गलती की!”

सुनील ने कैप्टन से कहा – “नहीं कैप्टन, मैंने सही किया. मैं जब हरीश के पास पहुंचा तब वह जीवित था और मुझे देखकर उसने बस इतना कहा ‘सुनील, मैं जानता था तुम ज़रूर आओगे’”.

Saturday, 21 December 2013

किस्सा दोस्ती का..!!



दो बूढ़े आदमी काफी सालों से अच्छे दोस्त थे दोनों की उम्र अब लगभग 90 वर्ष के आसपास होगी!

एक दिन उनमें से एक दोस्त बहुत बीमार हो गया उसका दूसरा दोस्त उसे रोज मिलने के लिए आता था और रोज वे अपने दोस्ती के किस्से दोहराते थे!

उन्हें लगभग अब यकीन हो चला था कि जो बीमार था वह चंद दिनों का ही मेहमान है!

एक दिन उसके बूढ़े दोस्त ने बिस्तर पर पड़े अपने दोस्त से कहा, देखो जब तुम मर जाओगे, मेरे लिए एक काम जरुर करना!

बिस्तर पर पड़े दोस्त ने पूछा, कौन सा काम?

तुम मरने के बाद स्वर्ग में क्रिकेट खेलतें है या नहीं खेलते इसके बारे में मुझे जरुर बताओगे!


दोनों ही क्रिकेट के बहुत दिवाने थे. क्यों नही! जरुर बिस्तर पर पड़े दोस्त ने कहा!




और एक दो दिन में ही बीमार पड़ा दोस्त भगवान को प्यारा हो गया!




कुछ दिन बाद जो जिंदा बूढ़ा दोस्त था उसे नींद में अपने मरे हुए दोस्त की आवाज सुनाई दी!  ”तुम्हारे लिए मेरे पास दो खबरें है…एक बुरी और एक अच्छी …”

दोस्त्: अच्छा तो सुनाओ क्या है खबर मेरे लिए. पहले अच्छी खबर बताना भाई.


 मरा हुआ दोस्त: अच्छी खबर यह है कि स्वर्ग में क्रिकेट खेलतें है!



 और उसने सपने में ही बड़बड़ाते हुए पूछ लिया और बुरी खबर?

दूसरे दोस्त ने कहा बुरी खबर यह है कि तुम्हें आने वाले बृहस्पतिवार के मैच में बोलिंग करनी है!:) :) :) :)

Monday, 9 December 2013

रेगिस्तान में दो मित्र..!!


दो मित्र रेगिस्तान में यात्रा कर रहे थे। सफर में किसी मुकाम पर उनका किसी बात पर वाद-विवाद हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि एक मित्र ने दूसरे मित्र को थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ खाने वाले मित्र को इससे बहुत बुरा लगा लेकिन बिना कुछ कहे उसने रेत में लिखा – “आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मुझे थप्पड़ मारा”।

वे चलते रहे और एक नखलिस्तान में आ पहुंचे जहाँ उनहोंने नहाने का सोचा। जिस व्यक्ति ने थप्पड़ खाया था वह रेतीले दलदल में फंस गया और उसमें समाने लगा लेकिन उसके मित्र ने उसे बचा लिया। जब वह दलदल से सही-सलामत बाहर आ गया तब उसने एक पत्थर पर लिखा – “आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मेरी जान बचाई”।

उसे थप्पड़ मारने और बाद में बचाने वाले मित्र ने उससे पूछा – “जब मैंने तुम्हें मारा तब तुमने रेत पर लिखा और जब मैंने तुम्हें बचाया तब तुमने पत्थर पर लिखा, ऐसा क्यों?”

उसके मित्र ने कहा – “जब हमें कोई दुःख दे तब हमें उसे रेत पर लिख देना चाहिए ताकि क्षमाभावना की हवाएं आकर उसे मिटा दें। लेकिन जब कोई हमारा कुछ भला करे तब हमें उसे पत्थर पर लिख देना चाहिए ताकि वह हमेशा के लिए लिखा रह जाए।”

Thursday, 24 October 2013

अकबर और वीरबल का मिलन..!!


अकबर को वीरबल कैसे मिले, इसके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन उनमें कोई भी पूर्णतः विश्वसनीय नहीं है। इस बारे में जो कथा सबसे अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती है, वह यहाँ दे रहा हूँ।
कहा जाता है कि वीरबल आगरा में किले के बाहर पान की दुकान करते थे। उस समय उनका नाम महेश था। एक बार बादशाह अकबर का एक नौकर उनके पास आया और बोला- ‘लाला, आपके पास एक पाव चूना होगा?’ यह सुनकर वीरबल चौंक गये और पूछा- ‘क्या करोगे एक पाव चूने का? इतने चूने की जरूरत कैसे पड़ गयी तुम्हें?’


वह बोला- ‘मुझे तो कोई जरूरत नहीं है, पर बादशाह ने मँगवाया है।’
वीरबल ने पूछा- ‘बादशाह ने मँगवाया है? जरा तफसील से बताओ कि क्यों मँगवाया है?’
वह बोला- ‘यह तो पता नहीं कि क्यों मँगवाया है। पर आज मैं रोज की तरह बादशाह के लिए पान लगाकर ले गया था। उसको मुँह में रखने के बाद उन्होंने पूछा कि तुम्हारे पास एक पाव चूना होगा? मैंने कहा कि है तो नहीं, लेकिन मिल जाएगा। तो बादशाह ने हुक्म दिया कि जाकर ले आओ। बस इतनी सी बात हुई है।’
‘तो मियाँ अपने साथ अपना कफन भी लेते जाना।’
यह सुनते ही वह नौकर घबड़ा गया- ‘क्.. क्.. क्या कह रहे हो, लाला? कफन क्यों?’
‘यह चूना तुम्हें खाने का हुक्म दिया जाएगा।’
‘क्यों? मैंने क्या किया है?’
‘पान में चूना ज्यादा लग गया है। इसलिए उसकी तुर्शी से तुम्हें वाकिफ कराने की जरूरत महसूस हुई है।’
‘लेकिन इतना चूना खाने से तो मैं मर जाऊँगा।’
‘हाँ, तभी तो कह रहा हूँ कि कफन साथ लेते जाना।’
अब तो वह नौकर थर-थर काँपने लगा। रुआँसा होकर बोला- ‘लाला,जब आप इतनी बात समझ गये हो, तो बचने की कोई तरकीब भी बता दो।’
वीरबल ने कहा- ‘एक तरकीब है। बादशाह के पास जाने से पहले तुम गाय का एक सेर खालिश घी पी जाना। जब चूना खाने का हुक्म मिले, तो चुपचाप खा जाना और घर जाकर सो जाना। तुम्हें कुछ दस्त-वस्त लगेंगे, लेकिन जान बच जायेगी।’

वह शुक्रिया करके चला गया।
घी पीकर और चूना लेकर वह बादशाह के पास पहुँचा- ‘हुजूर, चूना हाजिर है।’
अकबर ने कहा- ‘ले आये चूना? इसे यहीं खा जाओ।’
‘जो हुक्म हुजूर’ कहकर वह चूना खा गया। अकबर ने हुक्म दिया- ‘अब जाओ।’ कोर्निश करके वह चला गया।
अगले दिन वह फिर पान लेकर हाजिर हुआ। उसे देखकर अकबर को आश्चर्य हुआ- ‘क्या तुम मरे नहीं?’
‘आपके फजल से जिन्दा हूँ, हुजूर!’
‘तुम बच कैसे गये? मैंने तो तुम्हें एक पाव चूना अपने सामने खिलाया था।’
‘हुजूर, आपके पास आने से पहले मैंने गाय का एक सेर घी पी लिया था।’
‘यह तरकीब तुम्हें किसने बतायी? और तुम्हें कैसे पता था कि मैं चूना खाने का हुक्म दूँगा?’
‘मुझे नहीं पता था, लेकिन पान वाला लाला समझ गया था। उसी ने मुझे यह तरकीब बतायी थी, हुजूर।’
अब तो अकबर चौंका। बोला- ‘पूरी बात बताओ कि तुम दोनों के बीच क्या बात हुई?’
तब उस नौकर ने वह बातचीत कह सुनायी जो उसके और वीरबल के बीच हुई थी। यह सुनकर अकबर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। बोला- ‘यह पानवाला लाला तो बहुत बुद्धिमान मालूम होता है। तुम उसको हमारे पास लेकर आना। हम उसे अपना दोस्त बनायेंगे।’
तब वह नौकर वीरबल को लेकर अकबर के पास गया और इस प्रकार अकबर और वीरबल में मित्रता हुई।

Saturday, 18 May 2013

Koi Aisa Shaks Bhi Hua Kare..!!


Koi Aisa Shaks Bhi Hua Kare,
Meri Dhadkano Ko Suna Kare..

Mein Ye Zindgi Us Pe Waar Du,
Wo Jo Khuloos-e-Dil Se Wafa Kare..

Mere Qarb Ko Wo Samjh Sake,
Mere Dard Ki Wo Dawa Kare..

Mujhe Us Se ISHQ Pe Naaz Ho,
Wo Jo Talab Mein Meri Raha Kare..

Meri LAAJ Uska Gharoor Ho,
Meri Aabroo Ka wo Difa Kare..

Kare Mosamon Ke Azaab Mein Wo,
Bahaar Ban K Mila Kare..

Jo Zubaan Meri Khamosh Ho,
To Mere Dil Mein Jhaank Wo Liya Kare..

Mera Dukh Us Ka Bhi Dard Ho,
Mere Saath Wo Bhi Jala Kare..

Koi Aisa Shaks Bhi To Hua Kare......!!

Thursday, 9 May 2013

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया,,!!














चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया

जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया

सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया

आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया

आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया

अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया

गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया

अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे `कुँअर’ रूठ के जाने का शुक्रिया..!!

ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए..!!












ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,

ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,

कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,

उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,

मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,

उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझदार मे,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,

अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,

यूँ तो ‘मित्र’ का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए..!!