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Saturday, 25 May 2013

लिंकन की सहृदयता..!!



संयुक्त राज्य अमेरिका के महानतम राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन लोकतंत्र के मसीहा माने जाते हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले भी वे बहुत लोकप्रिय नेता थे। वे हमेशा जनमत का आदर करते थे। साधारण से साधारण व्यक्ति के अच्छे सुझाव को मान लेने में उन्हें संकोच नहीं होता था।



१८६० की बात है। ग्रेस नामक एक ११ वर्षीय बालिका ने अपने पिता के कमरे में टंगी लिंकन की तस्वीर पर दाढ़ी बना दी। पिता बहुत नाराज़ हुए लेकिन ग्रेस ने कहा कि लिंकन के चेहरे पर दाढ़ी होती तो वे ज्यादा अच्छे लगते क्योंकि वे दुबले-पतले हैं।

ग्रेस ने तय किया कि वह लिंकन को दाढ़ी रखने के लिए लिखेगी। उसने लिंकन को पत्र में लिखा – “चूंकि आप दुबले-पतले हैं इसलिए यदि आप दाढ़ी रख लें तो आप ज्यादा अच्छे दिखेंगे और आपके समर्थकों कि संख्या भी बढ़ जायेगी।”

लिंकन ने ग्रेस को उसके सुझाव के लिए धन्यवाद का पत्र भेजा। कुछ दिनों बाद वे जब ग्रेस के नगर में पहुंचे तो सभी ने उनका स्वागत किया। उन्होंने ग्रेस से मिलने कि इच्छा प्रकट की।

ग्रेस से मिलने पर उन्होंने बड़े प्यार से उसे गले लगा लिया और बोले – “प्यारी बिटिया, देखो मैंने तुम्हारा सुझाव मानकर दाढ़ी रख ली है।”

नन्ही ग्रेस खुशी से फूली न समाई।

बाद में लिंकन की दाढ़ी उनकी खास पहचान बन गई। एक नन्ही बालिका के सुझाव को भी इतना महत्त्व देनेवाले लिंकन अमेरिका के कुछ ही ऐसे राष्ट्रपतियों में गिने जाते हैं जिनका सम्मान पूरी दुनिया करती है।

जेफरसन की सादगी..!!



अमेरिकी डालर के अलग-अलग डिनोमिनेशन के नोटों पर किन-किन के चित्र छपे होते है? मेरी जानकारी में वे महानुभाव हैं जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, और थॉमस जेफरसन। यदि किसी को कोई और महाशय का नाम याद आता हो तो वो बताये। खैर, यह प्रसंग थॉमस जेफरसन के बारे में है जो अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थे।



बात बहुत पुरानी है। जेफरसन सन १८०० के आसपास अमेरिका के राष्ट्रपति थे। उन दिनों तक फोटोग्राफी का आविष्कार नहीं हुआ था। अख़बार वगैरह भी न के बराबर छपते थे। अमेरिका की राजधानी की शक्ल आज के किसी गाँव से बेहतर नहीं रही होगी। लोग अपने राष्ट्रपति को नहीं पहचानते थे।

जेफरसन मूलतः एक किसान थे। वे कृषकों और मजदूरों के प्रबल समर्थक थे। अमेरिका ने उन जैसा सादगीपूर्ण राष्ट्रपति कोई और न देखा होगा। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनका जीवन अत्यन्त सादा था।

एक बार वे किसी अन्य नगर में बड़े से होटल में गए और ठहरने के लिए कमरा माँगा। होटल मालिक ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और कमरा देने से इंकार कर दिया। जेफरसन चुपचाप वहां से चल दिए।

होटल में मौजूद किसी दूसरे व्यक्ति ने उन्हें पहचान लिया और उसने होटल मालिक को बताया कि उसने अमेरिका के राष्ट्रपति को कमरा देने से मना कर दिया है!

होटल का मालिक अपने नौकरों के साथ भागा-भागा उनकी तलाश में गया। जेफरसन अभी थोड़ी दूर ही गए थे। मालिक ने उनसे अपने बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी और होटल में चलने के लिए कहा।

जेफरसन ने उससे कहा – “यदि तुम्हारे होटल में एक साधारण आदमी के लिए जगह नहीं है तो अमेरिका का राष्ट्रपति वहां कैसे ठहर सकता है!?” यह कहकर वे किसी और होटल में ठहरने के लिए चले गए।

प्रेमचंद का कोट..!!



हिंदी के महानतम कथाकार प्रेमचंद का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था. उनके पास एक पुराना कोट था जो फट गया था लेकिन वे उसी को पहने रहते थे.

उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने कई बार उनसे नया कोट बनवाने के लिए कहा लेकिन प्रेमचंद ने हर बार पैसों की कमी बताकर बात टाल दी. एक दिन शिवरानी देवी ने उन्हें कुछ रुपये निकालकर दिए और कहा – “बाजा़र जाकर कोट के लिए अच्छा कपड़ा ले आइये.”

प्रेमचंद ने रुपये ले लिए और कहा – “ठीक है. आज कोट का कपड़ा आ जाएगा.”

शाम को उन्हें खाली हाथ लौटा देखकर शिवरानी देवी ने पूछा – “कोट का कपड़ा क्यों नहीं लाए?”

प्रेमचंद कुछ क्षणों के लिए चुप रहे, फिर बोले – “मैं कपड़ा लेने के लिए निकला ही था कि प्रैस का एक कर्मचारी आ गया. उसकी लड़की की शादी के लिए पैसों की कमी पड़ गई थी. उसने मुझे वह सब इतनी लाचारी और उदासी से बताया कि मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कोट के रुपये उसे दे दिए. कोट तो फिर कभी बन सकता है लेकिन लड़की की शादी नहीं टल सकती.”

शिवरानी देवी मन मसोस कर धीरे से बोलीं – “वो नहीं तो तुम्हें कोई और मिल जाता. मैं पहले ही जानती थी कि तुम्हारे हाथों में पैसे देकर कोट कभी नहीं आ सकता.”

प्रेमचंद के चेहरे पर संतोष की मुस्कान खिली हुई थी.

खोटा सिक्का..!!



यह एक सूफी कथा है. किसी गाँव में एक बहुत सरल स्वभाव का आदमी रहता था. वह लोगों को छोटी-मोटी चीज़ें बेचता था. उस गाँव के सभी निवासी यह समझते थे कि उसमें निर्णय करने, परखने और आंकने की क्षमता नहीं थी. इसीलिए बहुत से लोग उससे चीज़ें खरीदकर उसे खोटे सिक्के दे दिया करते थे. वह उन सिक्कों को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता था. किसी ने उसे कभी भी यह कहते नहीं सुना कि ‘यह सही है और यह गलत है’. कभी-कभी तो उससे सामान लेनेवाले लोग उसे कह देते थे कि उन्होंने दाम चुका दिया है, और वह उनसे पलटकर कभी नहीं कहता था कि ‘नहीं, तुमने पैसे नहीं दिए हैं’. वह सिर्फ इतना ही कहता ‘ठीक है’, और उन्हें धन्यवाद देता.

दूसरे गाँवों से भी लोग आते और बिना कुछ दाम चुकाए उससे सामान ले जाते या उसे खोटे पैसे दे देते. वह किसी से कोई शिकायत नहीं करता.

समय गुज़रते वह आदमी बूढ़ा हो गया और एक दिन उसकी मौत की घड़ी भी आ गयी. कहते हैं कि मरते हुए ये उसके अंतिम शब्द थे: – “मेरे खुदा, मैंने हमेशा ही सब तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए. मैं भी एक खोटा सिक्का ही हूँ, मुझे मत परखना. मैंने तुम्हारे लोगों का फैसला नहीं किया, तुम भी मेरा फैसला मत करना.”!!