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Wednesday, 19 November 2014

एक करोड़ का सवाल..!!

टीवी कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में एक करोड़ के अंतिम सवाल पर मुस्कुराते हुए बिग बी ने प्रतियोगी से कहा- ‘आप बहुत भाग्यशाली हैं, इस सीट पर बैठ कर एक करोड़ के सवाल का जवाब देने वाले आप पहले व्यक्ति हैं। जवाब आपको सोच समझ कर देना है। इसका जवाब सही देने पर आपको मिलेंगे एक करोड़ रुपये, प्रसिद्धि, सम्मान और गलत जवाब देने पर आप निराश हो कर लौटेंगे, क्योंकि आपने पचास लाख कमाने का भी अवसर खो दिया है। उन्होंने प्रतियोगी की तरफ व्यंग्यपपूर्ण मुस्कान बिखेरी।

प्रतियोगी ने कहा-‘जी।
‘कैसा लग रहा है आपको।' बिग बी ने पूछा।
जवाब मिला- बहुत रोमांचित हूँ।‘
मैं भी ।‘ बिग बी ने कहा। मैं भी देखना चाहता हूँ कि कौनसा सवाल है, एक करोड़ का। मुझे भी नहीं मालूम, विश्वास कीजिये मुझे भी नहीं मालूम।'

सभी हँसने लगे। कुर्सी सँभालते हुए बिग बी ने कार्यक्रम आगे बढ़ाया। वे बोले- ’तो आप तैयार हैं, एक करोड़ के सवाल को सुनने, पढ़ने और अपना भाग्य आजमाने के लिए?’
’हाँ।' प्रतियोगी ने भी मुसकुराकर कहा।
बिग बी ने हाथ मसलते हुए कहा- ‘तो लीजिये, आपका एक करोड़ का सवाल।' उन्होंने सवाल पहले अँग्रेजी में पढ़ा और फिर उसे हिदी में दोहराया ‘आज देश में बढ़ते असंतोष, भ्रष्टाड़चार, महँगाई और अनेक समस्याओं के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेमदार कौन है? और कहा- ‘जल्दबाजी नहीं, आपके पास बहुत समय है, सही जवाब आपको करोड़पति बना देगा और ग़लत जवाब आपको----आप--- समझते –ही-- हैं।'
प्रतियोगी बहुत देर तक सोचता रहा। बिग बी ने कहा- ‘आपके पास सारी सुविधाएँ भी खत्म हो गयी हैं। आप किसी से पूछ भी नहीं सकते। अब आपको ही निर्णय लेना है कि ए- जनता, बी- नेता, सी- सरकार और डी- पुलिस, इसमें से कौन-सा विकल्प चुनना है।'

थोड़े से सन्नाटे के बाद, प्रतियो‍गी ने कहा- ‘सरकार।' बिग बी ने कहा- ‘सी, सरकार।‘
"आप पूरी तरह से आश्वस्त हैं? जल्दमबाजी नहीं करें। सोचें, कि इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन है, जनता, नेता, सरकार या पुलिस। एक बार जवाब ताला लग गया, तो आपके सारे रास्तेज बंद, फि‍र मैं भी कुछ नहीं कर पाउँगा।'
’जी। मैं जानता हूँ, मेरा जवाब है ‘सी’ सरकार’।' प्रतियोगी ने कहा।

’तो आपको पूरा विश्वास हैं, सी, स—र—का—र।' बिग बी ने गंभीरता से कहा-‘तो लॉक कर दिया जाये?' ’जी।' ’तो लॉक किया जाये। कम्प्यूटर जी, जवाब लॉक करें, आपका जवाब है, सी-सरकार।'

जवाब लॉक कर दिया गया। थोड़े सन्नाटे के बाद बजर बजा। बिग बी अपनी सीट से उठ खड़े हुए और बोले- ‘ओ---ह।’ बैठे हुए प्रतियोगी के साथ-साथ कार्यक्रम में सम्मिलित लोगों में कौतूहल जाग गया। वे भी उठ कर कर खड़े हो गये।
’यह जवाब ग़लत है।' बिग बी के बोलते ही सन्नाटा छा गया। बिग बी ने प्रतियोगी से कहा- ‘आपका जवाब ग़लत था।
सही जवाब है- ‘जनता..!!

आत्महत्या..!!

वे दोने बड़ी देर से गाँव में थोड़ी दूरी पर स्थित लाइनों का पास घुम रहे थे। कभी इधर से उधर कभी उधर से इधर। वह रेलवे पटरी के इस ओर था, जब कि वह दूसरी ओर थी। एक से दूसरी ओर जाते हुए जब भी वे एक दूसरे की सीध में आते, कनखियों से एक दूसरे की ओर देखने लगते। दोनों एक दूसरे की स्थिति को समझ भी रहे थे।

इसी प्रकार जब काफी देर बीत गयी तो लड़के ने साहस जुटाते हुए पूछा- आप शायद किसी की प्रतीक्षा कर रही हैं।
-हाँ... और आप? लड़की अब थोड़ा आगे आ गई थी। दोनो रेल पटरी के साथ वाले कच्चे पथ से थोड़ा ऊपर कटे फटे पत्थरों पर आ खड़े हुए थे।
-मैं भी किसी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। कह कर लड़का फिर कच्चे पथ पर जिधर से आया था, उसी ओर बढ़ गया। लड़की भी उसके विपरीत वाली दिशा की ओर चल दी। अब जब वे एक दूसरे के निकट आए तो उन्होंने एक दूसरे की ओर कनखियों ने नहीं, अपितु थोड़ा-सा मुस्कुरा कर देखा।

अचानक लड़के ने लड़की के पास आकर कहा- सच बताइये कहीं आप निराश होकर... नहीं, ऐसा मत कीजियेगा। आप बहुत अच्छी हैं, सुंदर भी।
लड़का चलने को हुआ तो इस बार लड़की ने पूछ लिया- क्या आप भी... न-न, कोई गलत कदम न उठाइयेगा। कितने आकर्षक हैं आप...युवा भी।
-हाँ... इस बार बारी फिर लड़के की थी। - सच कहूँ...आया तो मैं सचमुच खुदकुशी करने के लिये ही था, किंतु शायद गाड़ी लेट हो गई हैं।
-मैं भी यदि सच कहूँ तो इरादा मेरा भी कुछ यही था... किन्तु आप हैं कि यहीं मंडराए जा रहे थे। मेरे आसपास। इसलिये आत्महत्या का अवसर ही नहीं मिला।

दोनो अब थोड़ा हटकर एक वृक्ष की छाया में जा बैठे थे, एक दूसरे के सामने।
-एक बात पूछूँ? लड़का जैसे संकोच को तोड़ना चाहता हो- आप आत्महत्या क्यों करना चाहती थीं? क्या किसी से प्रेम व्रेम का चक्कर...
-चक्कर नहीं, मैं सच में उससे प्रेम करती थी, परन्तु उसने मुझसे छल किया...वह शायद मुझसे नहीं मेरे जिस्म से प्यार करता था... धोखेबाज!... और आप? लड़की थोड़ा आगे सरक आई थी।
-आज मेरा विवाह होना तय था, परन्तु जिससे मेरा विवाह होने जा रहा था, वह एक रात पहले ही घर से भाग गई... शायद वह किसी और से प्रेम करती हो... पर मैं तो कहीं का भी नहीं रहा न! लड़के ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया था।

दोनों बड़ी देर ऐेसे ही बैठे रहे। अचानक धरती पर उपजे कंपन से दोनों ने जाना कि गाड़ी आने वाली है। अचानक लड़के ने कहा- मैंने इरादा बदल लिया है... मैं आत्महत्या नहीं करना चाहता। आप...?
- मैं भी तो मरना नहीं चाहती किन्तु...! अब लड़की ने भी लड़के का हाथ पकड़ लिया था।

इसी बीच गाड़ी बाएँ से आकर दायें को चली गई। अचानक लड़के ने पूछा क्या में सचमुच आकर्षक हूँ?
हूँ...! सच में। और मैं क्या सचमुच सुंदर हूँ? लड़की ने आँखें नीचे झुका लीं थीं।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद लड़की ने कहा- मुझे घर ले चलो... उसी वेदी पर जहाँ वह लड़की नहीं आ सकी। मैं...
- नहीं ! वह स्थान शायद आपके योग्य अब नहीं रहा। हम अपना अलग घर बसाएँगे...आओ चलें।
दोनो एक दूसरे का हाथ थामे वापस शहर की ओर चल पड़े।

महँगाई डायन..!!

संक्रान्ति के बाद आज पहली बार बाज़ार आया था। टुसू के बाद की शांति खत्म होने लगी थी। सुबह-सुबह की ठण्ड में जीवन अपनी भाग-दौड़ में लगा था। सब्जियों से लदी ऑटो को रास्ता देने के लिए एक किनारे हुआ तो पकते गुड़ की खुशबू ने रोक लिया। मैं खड़ा होकर अपने आस-पास की हलचल देखने लगा. आते-जाते लोगों के बीच से निगाहें उन हाथों पर रुक गयी जो मुढ़ी-गुड़ के 'लाई' बना रही थी। खड़े होकर मैंने मुँह से सांस छोड़ी। हवा में धुंध की एक चादर सी बन गयी। मैं मुस्कुराया। मुझे एक बच्चे जैसा मज़ा आया।

एक हाथ पॉकेट में डाले, दूसरे हाथ में थैला हिलाता मैं एक दुकान के सामने था।
"कैमोन आछो काकी?"
"भालो...."
आवाज़ ने शब्दों का साथ नही दिया।
"की चाई?"
"फूल कितने का?" मैं अब अपनी औकात पर आ गया था क्योंकि बांग्ला में मेरे हाथ जरा तंग हैं।
"आपसे क्या दाम करेगा बाबू? २० में बेच रहा है, आपको १९ में दे देगा..."
"और बैंगन? अरे हाँ... मूली कितने की है?"
काकी अनमने ढंग से सब्जी के टोकरे इधर उधर करती रही।
"कोई दिक्कत ....?" मेरे अन्दर का बच्चा काफुर हो चूका था।
"क्या बोलेगा बाबू, रमना गुस्सा है. एई लेके मन नई लगता है।"
"रमना... कौन?"
"मेरा लड़का, बाबू. कंपनी भीतरे ठीकादारी में काम करता है. आपको क्या चाहिए बाबू?"
"एक फूलगोभी, आधा किलो बैंगन और आधा किलो मूली दे दो।"
"गोभी का डंठल और मूली का पत्ता तोड़ के रख लेगा बाबू?"
"हाँ..हाँ. गोभी के डंठल और मूली के पत्ते तोड़ कर रख लेना।"
"ठीक है बाबू...." और उसने सारा सामान मेरे थैले में डाल दिया। मैंने पैसे दिए और घूमा कि एक युवक मुझे लगभग धकियाता दुकान की किनारे वाली गली में घुसा।

मैं बुरा-सा मुँह बना कर आगे बढ़ गया। मेरे पीछे का कोलाहल बढ़ते-बढ़ते शोर और फिर झगडे का रूप ले चुका था। जी में आया कि देखूं, आखिर हो क्या रहा है; किन्तु मुझ जैसा लेखक-टाईप आदमी ऐसी स्थितियों से बच कर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझता हैं। घूमते-घूमते अब मैं सब्जी-मंडी के दूसरी ओर हैंडपंप तक आ गया था। लोगों की लम्बी कतार के बीच काकी भी अपनी बाल्टी लिए दीख गयी।

मैं मुस्कुराया, "आपकी दुकान के पास क्या हल्ला-हंगामा हो रहा था?"
काकी कतार से बाहर आ गयी थी, "बाबू, आप ही बताओ; हम सब्जी काहे को बेचता है? पेट के लिए ना. लड़का को पढ़ा दिया, अब नौकरी भी लगा है, माँ कितना दिन खिलायेगा?"
"पर हुआ क्या?"
"पहले हम बचा-हुआ सब्जी उसका घर-वाली को दे आता था। उसका खर्चा बच जाता था। जबसे सब्जी महँगा हुआ है, हम अपने-ही गोभी का डंठल और सूखा साग खा रहा है, उसको कहाँ से देगा? उसको दे देगा तो महाजन का कर्जा कौन तोड़ेगा?" काकी की आँखें भर आयी थी। आँखों में दिल का दर्द छलक आया। मैं खामोश हो गया। कुछ समझ नही आया तो मैं आगे बढ़ गया. पास के सैलून से गाने की आवाज़ आ रही थी, "सखी सैयां तो खूबै कमात है, महँगाई डायन खाय जात है"।

तनाव..!!

साल में एक बार छोटा आता ही है परिवार सहित। और जब भी छोटा आता है बड़े के दिमाग में एक तनाव बना रहता है। ये तनाव तब तक बना रहता है जब तक छोटा इस घर में रहता है। यह बात वह किसी से कहता नहीं, किसी को मालूम भी नहीं होने देता, अपनी पत्नी को भी नहीं।
ये तनाव क्यों होता है जानता है वह।
जैसे ही फोन पर कबर मिलती है कि छोटा आ रहा , तब घर का नक्शा ही बदल जाता है। पूरे घर की साफ-सफाई होती है सोफे के कवर और खिड़कियाँ, दरवाजे के पर्दे बदल दिये जाते हैं। ये सब माँ ही करती है। उसकी समझ में नहीं आता कि क्यों? बैंक में मैनेजर है छोटा। ऊँची पोस्ट पर है। ऊँची सोसायटी में उठता बैठता है, शायद इसी वजह से। छोटा चाय नहीं, काफी पीता है। बच्चे हार्लिक्स पीते हैं। खाने पीने पर खास ध्यान दिया जाता है। माँ उसके ही बच्चों में खोई रहती है।
इस बीच वह यह भी महसूस करता है कि जब तक छोटा इस घर में रहता है उसका महत्त्व कम हो जाता है। किसी भी बात के लिये उससे सलाह नहीं ली जाती, नही उससे कुछ पूछा जाता है। पिताजी बैठे बैठे छोटे से ही बतियाते रहते हैं। यदि वह वहाँ पहुँच जाए तो चुप हो जाते हैं। बस, यही कारण है उसके तनाव का, वह महसूस करता है।
मोटर साइकिल स्टैंड पर खड़ी करते हुए उसने देखा कि छोटा और पिताजी ड्राइंग रूम में बैठे हुए बातें कर रह हैं। सामने टीवी चल रहा है। माँ उठकर दरवाजे पर आ गयी। माँ ने पूछा, "आज बहुत देर कर दी, कहाँ था?
"कहीं नहीं, यहीं ऐसे ही।" कहता हुआ वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। वह साफ झूठ बोल गया। तनाव की वजह से वह पिक्चर हाल में जाकर बैठ गया था। पिक्चर छूटने के बाद भी वह इधर-उधर घूमता रहाष रात के पूरे ग्यारह बजे तक।
वह कमरे में घुसा। बच्चे सो चुके थे। उसकी पत्नी पलंग पर लेटी हुई कोई मैगजीन पढ़ रही थी। कपड़े उतार कर वह बाथरूम में फ्रेश होने चला गया। वहाँ से आया तो तौलिये से हाथ मुँह पोंछते हुए पत्नी से बोला, "खाना लगा दो... बहुत भूख लगी है।"
"
अकेले ही खाओगे?" पलंग से उठती हुई पत्नी बोली।
"क्यों"?
"पिताजी और भाई साहब भी बिना खाना खाए बैठे हैं अभी तक... उन्होंने भी खाना नहीं खाया है। कब से तुम्हारी राह देख रहे हैं।" पत्नी ने कहा।
"अरे, उन्हें खा लेना चाहिये था।"
कभी तुम्हारे बगैर खाया है उन्होंने सब एक साथ ही तो खाते हैं। पत्नी ने कहा और खाना लगाने चली गई।

वह ठगा सा खड़ा रह गया उसका गहरा तनाव बर्फ बनकर पिघल गया।
खाना खाने के बाद वह पूरी तरह तनावमुक्त था।

Tuesday, 18 November 2014

विवशता..!!

कॉलेज छोड़ने के बाद यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। मित्र को न जाने कैसे पता चल गया कि मैं इस कॉलोनी में हूँ। कमरे में बैठते ही मैंने आवाज़ लगाई, ''सुनीता! देख, आज कौन आया है?''
पत्नी संभवतः घर पर नहीं थी। उत्तर नहीं मिला। इतने में मेरी पाँच वर्षीय लाड़ला आ धमका और पैरों से लिपटते हुए बोला, ''पापा! पापा! मम्मी गुप्ता आंटी के घर गई हैं।''

रोज़ का हाल है यह! किसी न किसी चीज़ के लिए पत्नी को पड़ोस में भागना पड़ता है। माह के आखिरी दिन थे। मित्र के अकस्मात आगमन से मैं मुश्किल में फँस गया था।
मित्र ने ध्यान भंग किया, ''और कितने बच्चे हैं... राजेश?''
''दो ओर हैं- एक लड़का... एक लड़की, दोनों स्कूल गए हैं!'' मैंने बरबस मुस्कराने का यत्न किया।
''अब और नहीं होने चाहिए।'' मित्र की फीकी हँसी बड़ी देर तक कमरे में लटकी रही।
समय निकलता जा रहा था और अभी तक हम चाय नहीं पी पाए थे। पत्नी की अनुपस्थिति खलने लगी। ''शायद, पत्नी स्कूल चली गई- बच्चों को लेने। आज हाफ डे है न!''
मैंने अपनी कमज़ोरी छिपाई। सच्ची-झूठी बातें कब तक झेलता। मैंने बबूल से कहा, ''बेटा! ज़रा देख तो आ मम्मी को। कहीं बिहारिन आँटी के घर न हों। अभी तक तो हम दो बार चाय पी चुके होते।''
''छोड़ भी यार। जब से बैठा हूँ। चाय की रट लगा रखी है। मैं हर पंद्रहवें दिन दिल्ली आता हूँ, फिर कभी पी लेंगे चाय... भाभी के हाथ की। मुझे चलने दे अब!'' यह कहकर मित्र उठ खड़ा हुआ।
मैंने रोकना चाहा पर वह नहीं माना और बबलू को दस का नोट थमाकर बाहर निकल आया। मैंने बबलू को खींचकर झट से अंदर किया और उसे समझाया, ''तुम यहीं रहना। मम्मी से कहना पापा बाज़ार गए हैं।''
बबलू सिर खुजलाता रह गया।
अब हम दोनों सड़क नाप रहे थे। मैंने कहा, ''यार! इतने दिनों बाद मिले और एक कप चाय भी न पिला पाया। घर न सही चलो किसी दुकान में बैठकर पी लेते हैं।''
हम दोनों एक ढाबे में बैठ गए। चाय के सा समोसे भी मँगा लिए थे। चाय पी चुकने के बाद मैंने कुछ हल्कापन महसूस किया। मैंने बड़े रोब में दुकानदार को पैसे बढ़ाए! यह क्या... मेरा हाथ काँप रहा था। दुकानदार बोला, ''बाबू जी! आज इतनी सर्दी नहीं है... फिर भी...।''
मेरे हाथ में बबलू को दिया गया मित्र का वह दस रुपए का नोट फड़फड़ा रहा था। शायद मित्र न समझ पाया हो। फिर भी मेरा हाथ बड़ी देर तक काँपता रहा।

बेबस विद्रोह..!!

उस दिन तो अजब हो गया। पलभर में हंगामा खड़ा हो गया। सुशीला अवाक खड़ी चुपचाप पार्वती का मुँह देख रही थी। कच्छा भीड़े हुए वह घायल शेरनी की तरह दहाड़ रही थी।
``मालकिन हम गरीब हैं। आपके घर में झाड़ू-बुहारू करते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारी कोई इज़्ज़त-विज़्ज़त नहीं है। आप लोगों को जब जो जी चाहे बोल लीजिए।'' बोलते-बोलते वह हाँफने लगी थी।
हाथ में पकड़े झाड़ू को उसने फेंक दिया और मालकिन की तरफ़ आँखें फाड़कर देखने लगी।
''अरे पार्वती क्या हुआ शांत हो जा। आखिर मैं भी तो सुनूँ बात क्या है? ऐसा क्या हुआ कि तूने सारा घर सर पर उठा लिया?'' पार्वती को शांत करती हुई सुशीला ने पूछा।
मालकिन की प्यार भरी बातों ने पार्वती को भीतर तक भींगो दिया। उसकी आँखें छलछला आईं। स्नेह पाकर उसके सब्र का बाँध टूट पड़ा। सुबकते हुए उसने कहा, ''मालकिन! अब मुझसे ई धर में काम नहीं होगा। जहाँ आदमी की इज़्ज़त न हो, वहाँ तो पल भर भी नहीं रुकना चाहिए। मालकिन! आप मेरा हिसाब कर दें। मैं दूसरी जगह चली जाऊँगी।''
''कर ले अपना हिसाब-किताब और फूट यहाँ से। नहीं तो...'' यह सुशीला की बहू की आवाज़ थी।
''नहीं तो, क्या कर लेंगीं आप? बोलिए न बीबी जी! मैं मुफ़्त के पैसे नहीं लेती। हाड़ तोड़ती हूँ तो पैसे लेती हूँ। फिर धौंस किस बात की?''
''अरी पार्वती! तू बहू की बातों पर न जा! उसने अभी दुनियादारी कहाँ देखी है। और तू बता, तू तो मुझे माँ जैसा आदर देती है। मैं भी तुझे बेटी की तरह मानती हूँ। तू बता, अगर तू सचमुच मेरी बेटी होती, तो क्या बहू के इतना कहने पर मुझे छोड़कर चली जाती?'' डबडबाई आँखों से सुशीला ने पार्वती को देखते हुए कहा।
सुशीला की डबडबाई आँखों को देखकर पार्वती के मन का गुस्सा ख़त्म हो गया था। उसने कुछ कहा नहीं। वह चुपचाप उठी और अपने को काम में लगा दिया।

Saturday, 25 October 2014

बीच का रास्ता..!!

"हाय, करूणा, आज कित्ते दिन बाद दिख रही है तू? मुझे लगा या तो नौकरी बदल ली तूने या ट्रेन?"
"कुछ नहीं बदला शुभदा, सब कुछ वही है, बस जरा होम फ्रंट पर जूझ रही थी, इसलिए रोज ही ये ट्रेन मिस हो जाती थी।"
"क्यों क्या हुआ? सब ठीक तो है ना?"
"वही सास ससुर का पुराना लफड़ा। होम टाउन में अच्छा खासा घर है। पूरी जिंदगी वहीं गुजारने के बाद वहाँ अब मन नहीं लगता सो चले आते हैं यहाँ। हम दोनों की मामूली सी नौकरी, छोटा सा फ्लैट और तीन बच्चे। मैं तो कंटाल जाती हूँ उनके आने से। समझ में नहीं आता क्या करूँ।"

"एक बात बता, तेरे ससुर क्या करते थे रिटायरमेंट से पहले?"
"सरकारी दफ्तर में स्टोरकीपर थे।"
"उनकी सेहत कैसी है?"
"ठीक ही है।"
"उन दोनों में से कोई बिस्तर पर तो नहीं है?"
"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है। बस, बुढ़ापे की परेशानियाँ है, बाकी तो...।"
"और तेरा सरकारी मकान है। तेरे ही नाम है ना...तेरे हस्बैंड की तो प्राइवेट नौकरी है . . . ?"
"हाँ है तो...।"
"और तेरे ससुर की पेंशन तो १५०० से ज्यादा ही होगी?"
"हाँ होगी कोई २३०० के करीब।"
"बिलकुल ठीक। और तू रोज रोज के यहाँ टिकने से बचना चाहती है?"
"चाहती तो हूँ, लेकिन मेरी चलती ही कहाँ है। घर में उनकी तरफदारी करने के लिए बैठा है ना श्रवण कुमार।"

"अब तेरी ही चलेगी। एक काम कर। अपने ऑफिस में एक गुमनाम शिकायत डलवा दे कि तेरे नॉन डिपेंडेंट सास ससुर बिना ऑफिस की परमिशन के तेरे घर में रह रहे हैं। तेरे ऑफिस वाले तुझे एक मेमो इश्यू कर देंगे, बस। सास ससुर के सामने रोने धोने का नाटक कर देना...कि किसी पड़ोसी ने शिकायत कर दी है। मैं क्या करूँ? ऐसी हालत में वे जायेंगे ही।"
"सच, क्या कोई ऐसा रूल है?"
"रूल है भी और नहीं भी। लेकिन इस मेमो से डर तो पैदा किया ही जा सकता है।"
"लेकिन शिकायत डालेगा कौन?"
"अरे, टाइप करके खुद ही डाल दे। कहे तो मैं ही डाल दूँ। मैंने भी अपने सास–ससुर से ऐसे ही छुटकारा पाया है।"

गुरु दक्षिणा..!!

"अरे मास्टरजी... आप? आइए.. आइए.." इतने वर्षों के बाद मास्टरजी को अचानक अपने सामने पा कर मैं चौंक ही गया था। मास्टरजी... कहने को तो गाँव के जरा से मिडिल स्कूल के हेडमास्टर.. मगर मेरे आदर्श शिक्षक, जिनकी सहायता और मार्गदर्शन की बदौलत ही उन्नति की अनगिनत सीढियां चढ़कर मैं इस पद पर पहुँचा था। बीस साल पहले की स्मृतियाँ अचानक लहराने लगी थी आँखों के सामने... तब और अब में जमीन -आसमान का फर्क था... कल का दबंग-कसरती शरीर अब जर्जर - झुर्रीदार हो चला था। आँखों पर मोटे फ्रेम की ऐनक, हाथ में लाठी जो उनके पाँवों के कंपन को रोकने में लगभग असफल थी। मैली सी धोती, उस पर लगे असंख्य पैबंद छुपाने को ओढी गई सस्ती सी शाल... मेरा मन द्रवित हो गया था। भाव अभिभूत होकर मैंने मास्टर जी के पाँव छू लिए। मास्टर जी के साथ आए दोनों व्यक्ति चकित थे.. मुझ जैसे बड़े अधिकारी को मास्टर जी के पाँव छूते देख और साथ ही एक अनोखी चमक आ गई थी उनके मुख पर कि मास्टर जी को साथ लाकर उन्होंने गलती नहीं की है। मास्टर जी के चहरे पर विवशता लहराने लगी थी, जैसे मेरा पाँव छूना उन्हें अपराध बोध से ग्रस्त किए दे रहा हो।

"कहिए, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? " क्या आदेश है मेरे लिए? " अपने चपरासी को चाय- नाश्ते का आर्डर देकर मैं उनसे मुखातिब हुआ।
"जी.., वो कल आपसे बात हुई थी ना..." मास्टर जी के साथ आए व्यक्ति ने मुझे याद दिलाया .." ये रवींद्र है, मास्टर जी का पोता .. इसी की नौकरी के सिलसिले में ...

यह व्यक्ति दो-तीन महीने से मेरे विभाग के चक्कर काट रहा था। वह चाहता था कि कैसे भी करके इसके बेटे को नियुक्ति मिल जाए। मैंने रवींद्र का रिकॉर्ड जाँचा था, अंक काफी कम थे। मैंने उन्हें समझाया थe कि मैं उसूलों का पक्का अधिकारी हूँ, योग्य व्यक्ति को ही नियुक्ति दूँगा। अब उनके साथ मास्टर जी का आना मेरी समझ में आ गया था। हालात आदमी को कितना विवश बना देते है। यही मास्टर जी जो एक ज़माने में उसूलों के पक्के थे। हमेशा कहते थे, "अपने काम को इतनी निपुणता से करो कि सामने वाले को तुम्हें गलत साबित करने का मौका ही न मिल पाए।" उन्हीं के उसूल तो मैंने अपनी जिन्दगी में उतर लिए थे और आज वे ही मास्टर जी मेरे सामने खड़े थे, एक अदनी सी नौकरी के लिए सिफारिश लेकर?

"ठीक है, मैं ध्यान रखूँगा, वैसे भी मास्टर जी साथ आए है, तो और कुछ कहने की जरुरत है ही नहीं।" मेरे शब्दों में न चाहते हुए भी व्यंग्य का पुट उभर आया था जिसे मास्टर जी ने समझ लिया था और उनकी हालत और भी दयनीय हो गए थी, वे विदा होने लगे तो मैंने अपना कार्ड निकाल कर मास्टर जी के हाथ में थमा दिया..." अभी शहर में है, तो घर जरूर आइए मास्टर जी "

मास्टर जी ने काँपते हाथों से कार्ड थाम लिया था। उनके जाने के बाद मैं बड़ा अस्वस्थ महसूस करता रहा। सहज होने की कोशिश में एक पत्रिका उलटने लगा कि दरबान ने आकर बताया, "साहब, कोई आपसे मिलने आये हैं।"
"उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाओ, मैं आता हूँ " कहकर मैं हाउस कोट पहनकर बाहर आया .. एक आश्चर्य मिश्रित धचका सा लगा... "अरे मास्टर जी , आप? आइए ना.. "

"नहीं बेटा, ज्यादा वक्त नहीं लूँगा तुम्हारा," मास्टर जी की आवाज में कम्पन मौजूद था। "सुबह उन लोगों के साथ मुझे देखकर तुम्हारे दिल पर क्या गुज़री होगी, मैं समझ सकता हूँ। मेरे ही द्वारा दी गई शिक्षा को मैं ही झुठलाने लगूँ तो यह सचमुच गुनाह है बेटा,, पर क्या करता, मजबूरी बाँध लाई मेरे पैर यहाँ तक रवींद्र का बाप मेरा दूर रिश्ते का भतीजा है। मेरे बच्चों ने आलस - आवारगी में सारे जमीन- जायदाद गँवा दी। मेरे अकेले की पेंशन पर क्या घर चलता ? उस पर पत्नी की बीमारी.. ढेरों रुपये का कर्जदार हो गया मैं ... मकान भी गिरवी पड़ा है। ब्याज देने के तो पैसे नहीं, असल कहाँ से देता ? तभी रवींद्र का बाप बोला कि यदि उसका जरा सा काम कर दूँ तो मेरा मकान छुडा देगा। कम से कम रहने का ठौर हो जायेगा, यही लालच यहाँ खींच लाया बेटा। पर तुम्हें देखकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। कुछ मसले ऐसे होते हैं जो समझौते के लायक नहीं होते। उनकी गरिमा कायम रहनी ही चाहिए। बेटा, तुम रवींद्र को मेरे कहने से नौकरी मत देना। अगर ठीक समझो, तभी उसे रखना।" कहकर मास्टर जी बाहर को चल पड़े थे.. मैं बुत बना खड़ा रह गया था..!!

बारिश..!!

पाठशाला से बाहर निकलकर सनी ने भयभीत निगाहों से आसमान की तरफ देखा। उसके दिल की धड़कन अचानक बहुत तेज हो गई थी। पूरा का पूरा आसमान काले बादलों से ढँका हुआ था और दूर पूरब की ओर बारिश शुरू हो चुकी थी। उसके पास छतरी नहीं थीं। यद्यपि सबेरे ही उसे लगा था कि वर्षा होने वाली है परंतु माँगने पर पिता ने गुम होने के डर से उसे छतरी नहीं दी थी। अब तो उसे भीगते हुए ही जाना होगा। फिर भी सच में उसे इस बात की चिंता उतनी नहीं थी कि अगर वह पानी में भींग गया तो उसे बुखार चढ़ जायेगा या सर्दी लग जायेगी, बल्कि वह इस बात से अधिक उद्विग्न था कि अगर मेह के कीचड़ में उसका नया जूता खराब हो गया तो पिता उसे बहुत मारेगा।

उसने देखा अब बारिश पूर्व की ओर से चलती हुई उसके बिलकुल करीब तक पहुँच गई थी। वह एकबारगी कुछ भी निर्णय नहीं कर पाया कि उसे मकान में छिप जाना चाहिए और पानी रुकने तक इंतजार करना चाहिए या तेजी से घर की ओर दौड़ पड़ना चाहिए। मगर बादल देखकर उसे लगा कि कल सबेरे से पहले तक झड़ी खत्म होने के कोई आसार नहीं हैं। फिर यह भी पक्का है कि वह कितना भी तेज दौड़े तो आधे घंटे से पहले तो घर नहीं पहुँच सकता है। फिर भी उसने तेजी से दौड़ना शुरू कर दिया। तनिक देर में ही पानी घना हो गया। वर्षा की मोटी–मोटी बूँदें उसके सिर पर ओले की तरह पड़ रही थीं पर उसने महसूस किया कि उसकी पीठ पर बूँदें नहीं पड़ रही क्योंकि पीठ पर किताबों का बस्ता उसकी ढाल बना हुआ था। तब उसे ध्यान आया कि नया जूता तो कीचड़ से भरकर सिर्फ कुछ खराब हो जायेगा लेकिन किताबें तो पूरी गल जायेंगी। उसने सोचा कि आज उसे नया जूता खराब करने और पुरानी किताब गलाने के जुर्म में पिछले सभी दिनों से अधिक पिटाई लगेगी।

वह तेजी से दौड़ता जा रहा था। हवा और पानी भी जैसे एक दूसरे से प्रतिद्वन्द्विता कर रहे थे। उसकी बगल से गाड़ियाँ सर्र–सर्र गुजर रही थीं। मोटर की गुर्र–गों जब उसके नजदीक आती वह आंखें बन्द कर लेता और गाड़ी के तेज पहियों से उड़ा कीचड़ मिला पानी कचाक से उसके कपड़ों को रंग देता।

उसने अब तक सिर्फ जूते और किताबों की चिंता की थी, पर देखा कि कपड़े तो उससे भी पहले खराब हो गये हैं। उसने सोचा अगर उसकी माँ जिन्दा होती तो शायद आज वह पिटने से बच जाता। उसने देख रखा था कि पड़ोस का पिता जब अपने बच्चों को कभी पीटता है तो उनकी माँ दौड़ कर उन्हें बचाने आ जाती है। मगर अब यहाँ तो कोई उपाय नहीं हैं। आज तो उसे तीन–तीन जुर्मों की सजा भुगतनी है।

पक्की सड़क अब समाप्त हो चुकी थी। अब वह कच्ची सड़क पर दौड़ रहा था। अभी दस मिनट से कम का रास्ता नहीं होगा। वह दौड़-दौड़ कर थक भी चुका था पर उसने दौड़ना जारी रखा। कच्ची सड़क का कीचड़ उसके जूतों में घुस गया और जूते के तलवे से भी मिट्टी का लोंदा चिपक गया था, इससे जूता बहुत भारी हो गया था। पर चलने के सिवाय कोई उपाय नहीं था। उसकी रफ्तार अब थोड़ी धीमी हो गई थी। ज्यों ज्यों घर नज़दीक आ रहा था, उसका भय बढ़ता जा रहा था। जब चलते–चलते अंततः घर सामने आ गया तो उसने देखा कि पिता पहले ही दफ्तर से लौट चुका था और बाहर बरामदे में ही खड़ा था। पिता को घर पर मौजूद देख कर उसे दुख भी हुआ कि घर इतनी जल्दी क्यों आ गया। उसने अपने जूते की ओर देखा और तन पर गीले कपड़ों को महसूस करते हुए बस्ते की गीली किताबों के बारे में सोचा।

फिर आतंकित आँखों से पिता को देखते हुए आगे बढ़ा। उसे लगा कि उसके पाँव उठ ही नहीं रहे हैं। जैसे किसी चीज से चिपक गये हों। पिता ने सनी को सजल नेत्रों से देखते हुए सोचा कि इसकी माँ अगर होती तो सुबह उसे जरूर छतरी ले जाने की इज़ाज़त दे दी होती। उसे पश्चाताप होने लगा कि बच्चे को भी अपने जैसा भुलक्कड़ समझकर उसने छतरी नहीं दी और गुम जाने के डर से खुद भी छतरी लेकर नहीं गया। दफ्तर से भींगता हुआ ही आया। यदि बच्चे को उसने छतरी दे दी होती तो निश्चय ही सम्भाल कर रखता।

पिता को अचानक उस पर बहुत स्नेह हो आया। उसने आगे बढ़कर उसे गोद में उठा लिया। सनी को इस पर विश्वास नहीं हो रहा था, पर जब उसे पूरा यकीन हो गया कि वह पिता की गोद में हैं तो उसे इसका कारण एकदम समझ में नहीं आया।

पिता ने घर के भीतर ले जाकर उसे मेज पर बिठा दिया और उसके जूते के फीते खोलने लगा। सनी की नजर कोने में रखे पिता के जूते पर गई। उन जूतों में उसके जूते से भी अधिक कीचड़ था। खूँटी से टंगे पिता के कपड़े मिट्टी से एकदम सने थे। उसने तभी मेज पर रखी पिता के दफ्तर की फाइल देखी, वह बिल्कुल गल चुकी थी..!!

थैंक्यू..!!

'एक मलाई कोफ्ता, एक कड़ाई पनीर, एक दाल मक्खनी और साथ में नान।'
आर्डर करने के बाद वे बीस मिनट प्रतीक्षा करते रहे। पानी आया, प्लेटें लगी, नेपकिन बिछे, बैरा खाना लाया-सभी व्यस्त हो गए। बीच में एक बार चम्मच बजाना पड़ा। लाल कोट वाला बैरा तेज़ी से आया-
'यस सर'
'एक दाल और तीन नान प्लीज़'
जब तक वह यह सब लाया बाकी की चीज़ें ठंडी हो चुकी थी।
'थैंक्यू' उन्होंने कहा।
यह मालरोडीय सभ्य परिवार जब उठा तो प्लेटों में जूठन का नाम तक नहीं था।
आईसक्रीम पार्लर से आईसक्रीम ली, थैंक्यू बोला और गाड़ी में बैठकर खाने लगे।


विभा ने खाना बनाया, डायनिंग टेबल पर लगाया और पति बच्चों की प्रतीक्षा करने लगी। पालक पनीर, कड़ाई गोभी, दहीं वड़े, गाजर का हलवा, पूड़ियाँ वगैरह। अमित ने ढेर सारी गोभी प्लेट में डाली और आलू जूठन की तरह फेंक दिए। निधि ने दहीं वड़े से नाक सिकोड़ा। कृति ने एक कम फूली पूड़ी को ऐसे पकड़ा, जैसे उसमें दोष बनाने वाले का हो। खाने के बाद सभी गाजर का हलवा ऐसे प्लेटों में डालने लगे जैसे उनको ओवर ईटिंग कराने का षडयंत्र रचा जा रहा हो। विभा पर खाना खाने का अहसान लादते हुए सभी धीरे-धीरे उठ गए। किसी के पास उसके लिए थैंक्यू नहीं था..!!

Friday, 17 October 2014

उदार दृष्टि..!!

पुराने जमाने की बात है। ग्रीस देश के स्पार्टा राज्य में पिडार्टस नाम का एक नौजवान रहता था। वह पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान बन गया था।

एक बार उसे पता चला कि राज्य में तीन सौ जगहें खाली हैं। वह नौकरी की तलाश में था ही, इसलिए उसने तुरन्त अर्जी भेज दी।
लेकिन जब नतीजा निकला तो मालूम पड़ा कि पिडार्टस को नौकरी के लिए नहीं चुना गया था।
जब उसके मित्रों को इसका पता लगा तो उन्होंने सोचा कि इससे पिडार्टस बहुत दुखी हो गया होगा, इसलिए वे सब मिलकर उसे आश्वासन देने उसके घर पहुंचे।

पिडार्टस ने मित्रों की बात सुनी और हंसते-हंसते कहने लगा, “मित्रों, इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे तो यह जानकर आनन्द हुआ है कि अपने राज्य में मुझसे अधिक योग्यता वाले तीन सौ मनुष्य हैं।”

न देने वाला मन..!!

 एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।

अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई। जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे। भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया। उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा। शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी..!!

Sunday, 28 September 2014

रजाई..!!

बेटा मैं तुझे कितनी बार कह चुकी हूँ कि छत पर जो चारपाई पड़ी है उस पर यह रजाई सूखने के लिये डाल आ, पर तू तो एक कान से सुनता है दूसरे से निकाल देता है।

माँ इस रजाई को ऊपर डालने की बात तो दूर मैं इसे छुऊँगा भी नहीं। माँ इसे तू बाहर क्यों नहीं फेंक देती। बाढ़ के गंदे पानी में भीगी इस सड़ी हुई रजाई को भला कौन ओढ़ेगा? बाढ़ का गंदा पानी पूरा दिन घर में रहा, कितनी बदबू हो गई थी, यहाँ तक कि घर में खड़ा होना भी मुश्किल  हो रहा था।
देख बेटा दू इसे ऊपर धूप मे सूखने डाल आ। एक बर सूख जाएगी तो तो मैं इसका अस्तर उधेड़कर तथा रूई धुनवाकर फिर से भरवा लूँगी।
माँ मैंने कह दिया, मैं इसे नहीं उठाऊँगा, न ही तुम्हें इसे दोबारा भरवाने दूँगी। उसने एक एक शब्द चबा कर अपनी माँ की गोद में डाल दिया।
दूसरे कमरे में बैठे उसके पिता सभी कुछ सुन रहे थे। वह उठकर उसी कमरे में चले आए जहाँ माँ तथा बेटे  वार्तालाप हो रही था। वे भी बेटे आग्र ह पूर्वक बोले, देख बेटा, ठीक है इसे नये सिरे से मत भरने दना। इसे सुखाकर किसी जरूरतमंद को तो दिया जा सकता है। कितने लोग सर्दियों में फुटपाथ पर ठंड से सिकुड़ रहे होते हैं जिसे भी मिलेगी वह दुआएँ तो देगा।
चलो पापा मैं इसे ऊपर सूखने डाल भी आता हूँ, यह सूख भी जाएगी। परन्तु इसे उठाकर फुटपाथ पर सोने वालों को कौन देने जाएगा। क्या यह गंदी रजाई उठाकर आप जाएँगे या मम्मी जाएँगी?
एक अजगर सा प्रश्न बेटे ने अपने माता पिता के सामने डाल दिया था जो काफी देर तक कमरे में मुँह बाए पसरा रहा। और कमरे में नीरवता छाई रही। अंततः उस चुप्पी को पापा ने ही तोड़ा, बेटा, मान लो इसे फुटपाथ पर सोने वालों को भी नही दिया जाता तो इसका निपटान कैसे होगा। इसे घर के बाहर भी तो नहीं फेंका जा सकता। इसका एक और हल हो सकता है कि इसे कल कूड़ेवाले से ही उठवा दिया जाए।
इस पर उनकी पत्नी आक्रोश जताते हुए बोली, वह इस महँगे अस्तर वाली रजाई को ऐसे ही कूड़े में नहीं फेंकना चाहती।
यह सुनते ही बेटा तुनक कर बोला, तो माँ तू ही जाने, मुझे इसे उठाने के लिये न कहना। इतना कह कर वह दूसरे कमरे में चला गया।
जब की हल निकलता नजर नहीं आया तो वह पत्नी को ओर देखर बोले, देखो मैं तुम्हें ऐसे अस्तर की एक और रजाई बनवा दूँगा। रही इस रजाई की बात, इसे मैं शाम को ढेहा बस्ती के पास जो नाला है उसके किनारे रख आऊँगा। इतना कहकर वे उठे और रजी को लेकर छत पर धूप में जाल आए। शाम को अँधेरा होते ही वह उस रजाई को नाले के पास छोड़ आए।
अभी वे धीमे धीमे कदमों से घर की ओर लौट रहे थे कि उन्होंने उस बुढिया को उसी रजाई को उठाए वहाँ से गुजरते हुए देखा। वह अपने मुँह में कुछ न कुछ बड़बड़ाती जा रही थी। कुछ टूटे फूटे शब्द उनके कान में भी पड़े- पिछला जाड़ा तो बोरी को ओढ़कर ही काटा था, इस बार तो तूने सुन ली और एक अच्छी सजाई भेज दी। सचमुच भगवान तू कितना दयालू है।

याद..!!

रेन में घुसते ही आज नोना को पता नहीं क्या हुआ, तेज तेज रोना शुरू कर दिया !

दो साल की बच्ची को समझाएँ भी तो कैसे ? माँ ने बहुत कोशिश की उसे सुलाने की पर पता नहीं आज क्या बात थी कि वह पिता की गोदी छोड़ने को तैयार नहीं! माँ गोद में लेकर बैठे तो फिर और तेज रोना शुरू! और माँ ट्रेन की गैलरी में टहले वह कुछ सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं था।

आखिरकार पिता ने बेटी को कंधे से लगाया और थपकी देते हुए टहलना शुरू किया ! हल्का सा गुनगुनाने लगे ! यात्री मंद मंद मुस्कुरा रहे थे, महिलाएँ कुछ भावुक हो उठीं! नोना थोड़ी देर बाद चुप हो गई, धीरे से पिता के कंधे पर सिर टिका दिया, आँखें रुक रुक कर बंद कीं और थोड़ी ही देर में मीठे सपनो में खो गयी !

आश्वस्त माँ, पिता की गोद से बच्ची को लेने के लिये उठी तो पिता की आँखे भीगी हुई थी !
माँ ने बच्ची को लेकर सीने से सटाया और पति की आँखों में आँखे डालकर शरारत से पूछा !
"बेटी पर इतना प्यार आया कि मोती बरस पड़े?"
"नहीं, बस, आज पता नहीं क्यों बाबूजी याद आ गए।"

दूरदर्शी..!!

 
एक आदमी सोना तोलने के लिए सुनार के पास तराजू मांगने आया। सुनार ने कहा, ‘‘मियाँ, अपना रास्ता लो। मेरे पास छलनी नहीं है।’’ उसने कहा, ‘‘मजाक न कर, भाई, मुझे तराजू चाहिए।’’

सुनार ने कहा, ‘‘मेरी दुकान में झाडू नहीं हैं।’’ उसने कहा, ‘‘मसखरी को छोड़, मै तराजू मांगने आया हूँ, वह दे दे और बहरा बन कर ऊटपटांग बातें न कर।’’

सुनार ने जवाब दिया, ‘‘हजरत, मैंने तुम्हारी बात सुन ली थी, मैं बहरा नहीं हूँ। तुम यह न समझो कि मैं गोलमाल कर रहा हूँ। तुम बूढ़े आदमी सुखकर काँटा हो रहे हो। सारा शरीर काँपता हैं। तुम्हारा सोना भी कुछ बुरादा है और कुछ चूरा है। इसलिए तौलते समय तुम्हारा हाथ काँपेगा और सोना गिर पड़ेगा तो तुम फिर आओगे कि भाई, जरा झाड़ू तो देना ताकि मैं सोना इकट्ठा कर लूं और जब बुहार कर मिट्टी और सोना इकट्ठा कर लोगे तो फिर कहोगे कि मुझे छलनी चाहिए, ताकि ख़ाक को छानकर सोना अलग कर सको। हमारी दुकान में छलनी कहां? मैंने पहले ही तुम्हारे काम के अन्तिम परिणाम को देखकर दूरदर्शिता से कहा था कि तुम कहीं दूसरी जगह से तराजू मांग लो।’’ 

दुख का कारण..!!

एक व्यापारी को नींद न आने की बीमारी थी। उसका नौकर मालिक की बीमारी से दुखी रहता था। एक दिन व्यापारी अपने नौकर को सारी संपत्ति देकर चल बसा। सम्पत्ति का मालिक बनने के बाद नौकर रात को सोने की कोशिश कर रहा था, किन्तु अब उसे नींद नहीं आ रही थी। 
एक रात जब वह सोने की कोशिश कर रहा था, उसने कुछ आहट सुनी। देखा, एक चोर घर का सारा सामान समेट कर उसे बांधने की कोशिश कर रहा था, परन्तु चादर छोटी होने के कारण गठरी बंध नहीं रही थी। 

नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला, इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा, भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ। इसी ने मेरे मालिक की नींद उड़ा रखी थी और अब मेरी। उसकी बातें सुन चोर की भी आंखें खुल गईं।

Tuesday, 23 September 2014

इच्छा..!!

हूँ...., आज माँ ने फिर से बैंगन की सब्जी बना कर डिब्बे में डाल दी। मुझे माँ पर गुस्सा आ रहा था ।  कितनी बार कहा है कि मुझे ये सब्जी पसंद नहीं, मत बनाया करो।

कालेज की कैंटीन में अपना टिफिन खोलते हुए, मैं यही सोच रहा था कि तभी मेरी नजर सामने सडक़ के पार पड़ी।

एक बूढ़ा व्यक्ति कूड़े के ढेर से कुछ निकाल कर खाता हुआ दिखाई दिया। मेरी नजरें खुद-ब- खुद झुक गई, मुझे अपनी सब्जी अब बिल्कुल भी बुरी नहीं लग रही थी।

- रंजीत सिंह


नौकरी..!!


रोज की तरह दफ़्तर जाते समय जब मैं मालरोड पहुंचा तो लोगों की भारी भीड़ देख ठिठक गया। नजदीक जा कर देखा तो एक सिपाही और कुछ व्यक्ति खून से लथपथ हुए एक व्यक्ति को हाथों पैरों से उठा कर एक तरफ कर रहे थे।

"ये तो खत्म हो गया लगता है ।" एक बूढ़ी औरत कह रही थी।
"सिर पर गहरी चोट लगी है शायद। कसूर इसका ही था, मैंने खुद देखा है, भला-चंगा जा रहा था, बस भी तेज नहीं थी, इसने अपनी साइकिल अचानक बस की ओर घुमा दी थी।" पास खड़ा एक और व्यक्ति बोला।

"अरे यार ये तो दीवान है, अपने दफ़्तर का फोरमैन, इसने तो परसों रिटायर होना था, यह तो बहुत बुरा हुआ। अभी तो इसके लडक़े भी कुंवारे हैं ।" पास में खड़े मेरे दोस्त के मुंह से दीवान का नाम सुन कर मैं जैसे सुन्न हो गया।

मुझे याद आया, अभी परसों शाम तो ये घर आया था, अपने बेटे की नौकरी की बात कर रहा था। मैंने उसे बताया था कि डिपार्टमैंट की तरफ से लडक़े को देने का कोटा खत्म कर दिया गया है। बस मौत हो जाने की सूरत में ही एक बच्चे को नौकरी मिल सकती है।

मेरी बात सुन कर वो उठा और चला गया था। उसके चेहरे की उस अन्जानी सी खुशी का राज मुझे अब समझ आ रहा था।

- रंजीत सिंह

Thursday, 28 August 2014

बूढा और बेटा..!!

एक बहुत बड़े घर में ड्राइंग रूम में सोफा पर एक 80 वर्षीय वृद्ध अपने 45 वर्षीय पुत्र के साथ बैठे हुए थे। पुत्र बहुत बड़ा विद्वान् था और अखबार पढने में व्यस्त था।
तभी कमरे की खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया।
पिता ने पुत्र से पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र ने कहा – “कौवा है”।

कुछ देर बाद पिता ने पुत्र से दूसरी बार पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र ने कहा – “अभी दो मिनट पहले तो मैंने बताया था कि ये कौवा है।”
ज़रा देर बाद बूढ़े पिता ने पुत्र से फ़िर से पूछा – “ये खिड़की पर क्या बैठा है?”
इस बार पुत्र के चेहरे पर खीझ के भाव आ गए और वह झल्ला कर बोला – “ये कौवा है, कौवा!”
पिता ने कुछ देर बाद पुत्र से चौथी बार पूछा – “ये क्या है?”

पुत्र पिता पर चिल्लाने लगा – “आप मुझसे बार-बार एक ही बात क्यों पूछ रहे हैं? चार बार मैंने आपको बताया कि ये कौवा है! आपको क्या इतना भी नहीं पता! देख नहीं रहे कि मैं अखबार पढ़ रहा हूँ!?”

पिता उठकर धीरे-धीरे अपने कमरे में गया और अपने साथ एक बेहद फटी-पुरानी डायरी लेकर आया। उसमें से एक पन्ना खोलकर उसने पुत्र को पढने के लिए दिया। उस पन्ने पर लिखा हुआ था:
“आज मेरा तीन साल का बेटा मेरी गोद में बैठा हुआ था तभी खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया। उसे देखकर मेरे बेटे ने मुझसे 23 बार पूछा – पापा-पापा ये क्या है? – और मैंने 23 बार उसे बताया – बेटा, ये कौवा है। – हर बार वो मुझसे एक ही बात पूछता और हर बार मैं उसे प्यार से गले लगाकर उसे बताता – ऐसा मैंने 23 बार किया।”

पेंचकस..!!

इस घटना का ज़िक्र पाउलो कोएलो ने अपने ब्लॉग में किया है:

अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले मेरे श्वसुर ने अपने पूरे परिवार को बुलाया.
वे बोले, “मैं यह मानता हूँ कि मृत्यु हमारे लिए दूसरी दुनिया में प्रवेश करने का मार्ग है. मेरे चले जाने के बाद मैं तुम्हें एक संकेत भेजूंगा कि दूसरों के भले के लिए काम करते रहना ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है”.
उनकी इच्छा के अनुसार उनका दाह-संस्कार किया गया और उनकी अस्थियों को अर्पोआदार के समुद्रतट पर बिखेर दिया गया. पार्श्व में उनका पसंदीदा संगीत टेप-रिकॉर्डर पर बजता रहा.

अपने परिवार को संबोधित करने के दो दिन के बाद वे चल बसे. एक मित्र ने साओ पाउलो में उनकी अंतिम क्रिया की व्यवस्था की. रियो में वापसी पर हम अस्थिपात्र, संगीत के कैसेट, और टेप-रिकॉर्डर लेकर सीधे समुद्रतट पर गए. वहां पहुँचने पर एक मुश्किल खड़ी हो गयी. अस्थिपात्र के ढक्कन को कई पेंच लगाकर मजबूती से बंद किया हुआ था. हम उसे खोल नहीं पा रहे थे.

वहां मदद के लिए कोई नहीं था. पास मौजूद एक भिखारी हमारी उलझन देखकर हमारे पास आया और उसने पूछा, “कोई परेशानी है क्या?”
मेरे श्याले ने कहा, “मेरे पिता की अस्थियाँ इसमें बंद हैं और हमारे पास इसे खोलने के लिए पेंचकस नहीं है”.
“आपके पिता यकीनन बहुत अच्छे आदमी रहे होंगे, क्योंकि मेरे पास यह है”, उसने अपने झोले में हाथ डाला और एक पेंचकस निकालकर दिया.