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Thursday, 24 October 2013

इंसान नहीं भूत परोसते हैं भोजन..!!



आपको ऐसे रेस्‍त्रां की सैर कराने जा रहे हैं, जिसमें प्रवेश करने के बाद लोग थर-थर कांपने लगते हैं। ऐसा माहौल जिसमें डर लगना तो पक्‍का है, क्‍योंकि इस रेस्‍त्रां में इंसान नहीं भूत भोजन परोसते हैं और भोजन लाशों के बीच में होता है। चौंकिये नहीं, असल में हम बात कर रहे हैं दुनिया के अजब गजब रेस्‍त्रां में शामिल स्‍पेन के ला मासिया एंकांटडा की।

इस रेस्‍त्रां का कॉनसेप्‍ट असल में इसके इतिहास से प्रेरित है। इतिहास- 17वीं सेंचुरी में जोसफ मा रिएस ने मासिया और सुरोका ने मासिया सेंटा रोज़ा बनवाया। लेकिन आगे चलकर संपत्ति पर पारिवारिक विवाद हो गया। एक दिन सुरोका और रिएस ने कार्ड उछाल कर अपनी किसमत तय की। रिएस सारी संपत्ति हार गये। उनके परिवार ने घर छोड़ दिया और परिवार ने नई संपत्ति खड़ी की। देखते ही देखते यह इमारत खंडहर में तब्‍दील हो गई।

दो सदियों तक वीरान पड़ी रही इमारत में सुरोका के वंशजों ने 1970 में एक रेस्‍त्रां बनाया। उनका परिवार  मानता था कि इस इमारत को कोई शाप लग गया है, लिहाजा वहीं से उनके दिमाग में बात आयी कि क्‍यों न रेस्‍त्रां को हॉन्‍टेड रेस्‍त्रां के रूप में चलाया जाये। बस तब से लेकर आज तक ये रेस्‍त्रां हॉन्‍टेड रेस्‍त्रां के रूप में चल रहा है।
और भी हैं अजब-गजब रेस्‍त्रां यहां पर भूतों के वेश में वेटर भोजन परोस्‍ते हैं और भोजन का समय निर्धारित है। निर्धारित समय पर जब ग्राहक पहुंचते हैं, तो उनका स्‍वागत खून से सने चाकू, तलवार या हसिये से किया जाता है। आगे बढ़ते ही पंजा, या नकली लाशें जो देखने में एकदम असली हैं, लटकी मिलती हैं। भोजन करते वक्‍त ग्राहकों के लिये एक शो का संचालन किया जाता है, जिसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं। 

इस रेस्‍त्रां की कुछ महत्‍वपूर्ण बातें:-

 रेस्‍त्रां में तीन घंटे का भोजन
रेस्‍त्रां में एक शो तीन घंटे का होता है यानी आपका भोजन भी तीन घंटे तक चलता है। इसमें तरह-तरह के भूत-प्रेत के वेश में लोग आपका मनोरंजन करने के साथ-साथ कुछ अलग परोसने की कोशिश करते हैं, जिनसे आप निश्चित रूप से डर जायेंगे।

दिल के मरीज व प्रगनेंट महिलाएं नहीं

इस रेस्‍त्रां में दिल के मरीजों, अस्‍थमा के मरीजों और प्रेगनेंट महिलाओं को भोजन करना मना है, क्‍योंकि डर के कारण दिल व अस्‍थमा के मरीजों की तबियत बिगड़ सकती है, वहीं गर्भ के अंदर बच्‍चे पर बुरा असर पड़ सकता है। साथ ही विकलांगों का प्रवेश भी वर्जित है।

14 साल से नीचे का प्रवेश प्रतिबंधित
इस रेस्‍त्रां में 14 साल से नीचे के बच्‍चों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। ऐसा इसलिये क्‍योंकि हॉरर शो से वो डर सकते हैं।

ग्राहक भी शो का हिस्‍सा

खास बात यह  है कि इस हॉरर शो में ग्राहक महज मूक दर्शक बनकर  नहीं बैठ सकता। वो दुख भी डरावनी कहानियों का हिस्‍सा बन जाते हैं, जिस वजह से डर तो लाजमी है।

जादूगर का जादू
डराने के लिये जरूरी है, कि कुछ ऐसा हो, जो विस्‍मयकारी लगे, लिहाजा यहां जादूगर का जादू भी प्रस्‍तुत किया जाता है, जो पूरी तरह हॉन्‍टेड होता है।

प्रवेश करते ही शुरू होता है शो

इस रेस्‍त्रां में बुकिंग करते वक्‍त ही आपको समय दे दिया जाता है। खास बात यह है कि जैसे ही आप रेस्‍त्रां में प्रवेश करेंगे, वैसे ही शो शुरू हो जायेगा जो डराने के लिये काफी है। रेस्‍त्रां में मोबाइल लेजाना मना है।

रेस्‍त्रां में 60 सीटें
रेस्‍त्रां में कुल 60 सीटें हैं, लेकिन शो तभी आयोजित किया जाता है, जब कम से कम 35 लोग डिनर या लंच करने आयें। रेस्‍त्रां में प्रवेश बुकिंग के आधार पर ही दिया जाता है। रेस्‍त्रां की टेबल-चेयर व इंटीरियर इस तरह बनाया गया है, जैसे कोई भूतों का अड्डा हो।

भूतों के वेश में वेटर

यहां पर भूतों के वेश में वेटर भोजन परोस्‍ते हैं और भोजन का समय निर्धारित है। निर्धारित समय पर जब ग्राहक पहुंचते हैं, तो उनका स्‍वागत खून से सने चाकू, तलवार या हसिये से किया जाता है।


लाशों के बीच भोजन

आगे बढ़ते ही पंजा, या नकली लाशें जो देखने में एकदम असली हैं, लटकी मिलती हैं। भोजन करते वक्‍त ग्राहकों के लिये एक शो का संचालन किया जाता है, जिसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं।

अकबर और वीरबल का मिलन..!!


अकबर को वीरबल कैसे मिले, इसके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन उनमें कोई भी पूर्णतः विश्वसनीय नहीं है। इस बारे में जो कथा सबसे अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती है, वह यहाँ दे रहा हूँ।
कहा जाता है कि वीरबल आगरा में किले के बाहर पान की दुकान करते थे। उस समय उनका नाम महेश था। एक बार बादशाह अकबर का एक नौकर उनके पास आया और बोला- ‘लाला, आपके पास एक पाव चूना होगा?’ यह सुनकर वीरबल चौंक गये और पूछा- ‘क्या करोगे एक पाव चूने का? इतने चूने की जरूरत कैसे पड़ गयी तुम्हें?’


वह बोला- ‘मुझे तो कोई जरूरत नहीं है, पर बादशाह ने मँगवाया है।’
वीरबल ने पूछा- ‘बादशाह ने मँगवाया है? जरा तफसील से बताओ कि क्यों मँगवाया है?’
वह बोला- ‘यह तो पता नहीं कि क्यों मँगवाया है। पर आज मैं रोज की तरह बादशाह के लिए पान लगाकर ले गया था। उसको मुँह में रखने के बाद उन्होंने पूछा कि तुम्हारे पास एक पाव चूना होगा? मैंने कहा कि है तो नहीं, लेकिन मिल जाएगा। तो बादशाह ने हुक्म दिया कि जाकर ले आओ। बस इतनी सी बात हुई है।’
‘तो मियाँ अपने साथ अपना कफन भी लेते जाना।’
यह सुनते ही वह नौकर घबड़ा गया- ‘क्.. क्.. क्या कह रहे हो, लाला? कफन क्यों?’
‘यह चूना तुम्हें खाने का हुक्म दिया जाएगा।’
‘क्यों? मैंने क्या किया है?’
‘पान में चूना ज्यादा लग गया है। इसलिए उसकी तुर्शी से तुम्हें वाकिफ कराने की जरूरत महसूस हुई है।’
‘लेकिन इतना चूना खाने से तो मैं मर जाऊँगा।’
‘हाँ, तभी तो कह रहा हूँ कि कफन साथ लेते जाना।’
अब तो वह नौकर थर-थर काँपने लगा। रुआँसा होकर बोला- ‘लाला,जब आप इतनी बात समझ गये हो, तो बचने की कोई तरकीब भी बता दो।’
वीरबल ने कहा- ‘एक तरकीब है। बादशाह के पास जाने से पहले तुम गाय का एक सेर खालिश घी पी जाना। जब चूना खाने का हुक्म मिले, तो चुपचाप खा जाना और घर जाकर सो जाना। तुम्हें कुछ दस्त-वस्त लगेंगे, लेकिन जान बच जायेगी।’

वह शुक्रिया करके चला गया।
घी पीकर और चूना लेकर वह बादशाह के पास पहुँचा- ‘हुजूर, चूना हाजिर है।’
अकबर ने कहा- ‘ले आये चूना? इसे यहीं खा जाओ।’
‘जो हुक्म हुजूर’ कहकर वह चूना खा गया। अकबर ने हुक्म दिया- ‘अब जाओ।’ कोर्निश करके वह चला गया।
अगले दिन वह फिर पान लेकर हाजिर हुआ। उसे देखकर अकबर को आश्चर्य हुआ- ‘क्या तुम मरे नहीं?’
‘आपके फजल से जिन्दा हूँ, हुजूर!’
‘तुम बच कैसे गये? मैंने तो तुम्हें एक पाव चूना अपने सामने खिलाया था।’
‘हुजूर, आपके पास आने से पहले मैंने गाय का एक सेर घी पी लिया था।’
‘यह तरकीब तुम्हें किसने बतायी? और तुम्हें कैसे पता था कि मैं चूना खाने का हुक्म दूँगा?’
‘मुझे नहीं पता था, लेकिन पान वाला लाला समझ गया था। उसी ने मुझे यह तरकीब बतायी थी, हुजूर।’
अब तो अकबर चौंका। बोला- ‘पूरी बात बताओ कि तुम दोनों के बीच क्या बात हुई?’
तब उस नौकर ने वह बातचीत कह सुनायी जो उसके और वीरबल के बीच हुई थी। यह सुनकर अकबर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। बोला- ‘यह पानवाला लाला तो बहुत बुद्धिमान मालूम होता है। तुम उसको हमारे पास लेकर आना। हम उसे अपना दोस्त बनायेंगे।’
तब वह नौकर वीरबल को लेकर अकबर के पास गया और इस प्रकार अकबर और वीरबल में मित्रता हुई।

'मौत का त्रिकोण'



संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण पूर्वी अटलांटिक महासागर के अक्षांश 25 डिग्री से 45 डिग्री उत्तर तथा देशांतर 55 से 85 डिग्री के बीच फैले 39,00,000 वर्ग किमी के बीच फैली जगह, जोकि एक काल्पनिक त्रिकोण जैसी दिखती है, बरमूडा त्रिकोण अथवा बरमूडा त्रिभुज के नाम से जानी जाती है।

इस त्रिकोण के तीन कोने बरमूडा, मियामी तथा सेन जआनार, पुतौरिका को स्पर्श करते हैं। वर्ष 1854 से इस क्षेत्र में कुछ ऐसी घटनाऍं/दुर्घटनाऍं घटित होती रही हैं कि इसे 'मौत के त्रिकोण' के नाम से जाना जाता है।

बरमूडा त्रिकोण पहली बार विश्व स्तर पर उस समय चर्चा में आया, जब 1964 में आरगोसी नामक पत्रिका में इस पर लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख को विसेंट एच गोडिस ने लिखा था। इसके बाद से लगातार सम्पूर्ण विश्व में इस पर इतना कुछ लिखा गया कि 1973 में एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में भी इसे जगह मिल गई।

बरमूडा त्रिकोण की सबसे विख्यात दुर्घटना 5 सितम्बर 1945 में हुई, जिसमें पॉंच तारपीडो यान नष्ट हो गये थे। उन उड़ानों का नेतृत्व कर रहे चालक ने दुर्घटना होने के पहले अपना संदेश देते हुए कहा था- हम नहीं जानते कि पश्चिम किस दिशा में है। सब कुछ गलत हो गया है। हमें कोई भी दिशा समझ में नहीं आ रही है। हमें अपने अड्डे से 225 मील उत्तर पूर्व में होना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि !


और उसके बाद आवाज आनी बंद हो गई। उन यानों का पता लगाने के लिए तुरंत ही मैरिनर फ्लाइंग बोट भेजी गई थी, जिसमें 13 लाग सवार थे। लेकिन वह बोट भी कहँ गई, इसका भी पता नहीं चला।

इस तरह की तमाम घटनाएँ उस क्षेत्र में होने का दावा समय समय पर किया जाता रहा है। लेकिन यह सब किन कारणों से हो रहा है, यह कोई भी बताने में अस्मर्थ रहा है। इस सम्बंध में चार्ल्स बर्लिट्ज ने 1974 में अपनी एक पुस्तक के द्वारा इस रहस्य की पर्तों को खोजने का दावा किया था। उसने अपनी पुस्तक 'दा बरमूडा ट्राइएंगिल मिस्ट्री साल्व्ड' में लिखा था कि यह घटना जैसी बताई जाती है, वैसी है नही। बॉम्बर जहाजों के पायलट अनुभवी नहीं थे। चार्ल्स के अनुसार वे सभी चालक उस क्षेत्र से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे और सम्भवत: उनके दिशा सूचक यंत्र में खराबी होने के कारण खराब मौसम में एक दूसरे से टकरा कर नष्ट हो गये।


बहरहाल समय-समय पर इस तरह के ताम दावे इस त्रिकोण के रहस्य को सुलझाने के किए जाते रहे हैं। कुछ रसायन शास्त्रियों क मत है कि उस क्षेत्र में 'मीथेन हाइड्रेट' नामक रसायन इन दुर्घटनाओं का कारण है। समुद्र में बनने वाला यह हाइड्राइट जब अचानक ही फटता है, तो अपने आसपास के सभी जहाजों को चपेट में ले सकता है। यदि इसका क्षेत्रफल काफी बड़ा हो, तो यह बड़े से बड़े जहाज को डुबो भी सकता है।

वैज्ञानिकों का मत है कि हाइड्राइट के विस्फोट के कारण डूबा हुआ जहाज जब समुद्र की अतल गहराई में समा जाता है, तो वहाँ पर बनने वाले हाइड्राइट की तलछट के नीचे दबकर गायब हो जाता है। यही कारण है कि इस तरह से गायब हुए जहाजों का बाद में कोई पता-निशां नहीं मिलता। इस क्षेत्र में होने वाले वायुयानों की दुर्घटना के सम्बंध में वैज्ञानिकों का मत है कि इसी प्रकार जब मीथेन बड़ी मात्रा में वायुमण्डल में फैलती है, तो उसके क्षेत्र में आने वाले यान का मीथेन की सांद्रता के कारण इंजन में ऑक्सीजन का अभाव हो जाने से वह बंद हो जाता है। ऐसी दशा में विमान पर चालक का नियंत्रण समाप्त हो जाता है और वह समुद्र के पेट में समा जाता है। अमेरिकी भौगोलिक सवेक्षण के अनुसार बरमूडा की समुद्र तलहटी में मीथेन का अकूत भण्डार भरा हुआ है। यही वजह है कि वहाँ पर जब-तब इस तरह की दुर्घटनाएँ होती रहती हैं।

बहरहाल इस तर्क से भी सभी वैज्ञानिक सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि बरमूडा त्रिकोण अभी भी एक अनसुलझा रहस्य ही बना हुआ है। इस रहस्य से कभी पूरी तरह से पर्दा हटेगा, यह कहना मुश्किल है।


बरमूडा त्रिकोण क्षेत्र में जमीन पर हुई घटनाएं:-


1. सन् 1969 में बिमिनी, बाहामास स्थित ग्रेट आइजैक लाइटहाउस पर कार्यरत दो कर्मचारी अचानक लापता हो गये और फिर कभी नहीं मिले।

 बरमूडा त्रिकोण की समुद्री घटनाएं:-
  1. 4 मार्च 1918: पानी में चलनेवाला अमेरिकी जहाज साइक्लॉप्स, 309 लोगों के साथ गायब हो गया।

  2. 1 दिसंबर 1925: चाल्र्सटन, दक्षिण कैरोलीना से हवाना, क्यूबा के लिए चलने के बाद पानी के जहाज सोटोपैक्सी ने रेडियो सिगल पर संदेश जारी किया कि जहाज डूब रहा है। उसके बाद जहाज की कोई खबर नहीं मिली।

  3. 23 नवंबर 1941: अमेरिकी जहाज प्रोटिअस, 58 लोगों के साथ वर्जिन आइलैंड के लिए चला. इस पर बॉक्साइट लदा हुआ था। दो दिनों बाद इसका कोई पता नहीं चला। इसके अगले महीने उसी कंपनी का दूसरा जहाज नेरेअस 61 लोगों के साथ उसी क्षेत्र के आसपास से लापता हो गया।

  4. 2 फरवरी 1963: सल्फर क्वीन नामक जहाज 15 हजार दो सौ 60 टन सल्फर के साथ ब्यूमोंट, टेक्सास के लिए चला। इस पर चालक दल के 39 सदस्यसवार थे। 4 फरवरी को प्राप्त रेडियो सिग्नलों के अनुसार, यह तेज समुद्री आंधी में फंस गया और इसके दो दिन बाद इसकी कोई खोज-खबर नहीं मिली। 
बरमूडा त्रिकोण की वायुयान दुर्घटनाएं:-
  1. 5 दिसंबर 1945: फ्लाइट 19 में सवार 14 वायु सैनिकों का एक दल लापता हुआ, उसी दिन उसकी तलाश में 13 सदस्यों के साथ निकला पीबीएम मरीनर भी लापता हुआ।

  2. 30 जनवरी 1948: स्टार टाइगर नामक हवाई जहाज चालक दल के छह सदस्यों और 25 यात्रियों के साथ लापता हो गया।

  3. 28 दिसंबर 1948: डगलस डीसी-3 हवाई जहाज चालक दल के तीन सदस्यों और 36 यात्रियों के साथ लापता हुआ।

  4. 17 जनवरी 1949: स्टार एरियल वायुयान चालक दल के सात सदस्यों और 13 यात्रियों के साथ लापता हो गया।

Monday, 27 May 2013

एक घर जहां आज भी मुर्दे घुमतें है..!!



यह सुनकर आपकों थोड़ा अजीब जरूर लग रहा होगा, लेकिन यह सच है। इस दुनिया में एक ऐसी भी जगह है जहां एक घर जो कि अपने ही निर्माण कराने वालें लोगों की मौत का गवाह बना खड़ा है। इन मौतों को हुए बहुत समय बीत गया लेकिन उन लोगों को उनके घर में, कमरों में आज भी देखा जाता है। इस घर में किसी की मौत अपने आप हुयी तो किसी ने बिमारी के चलते जान गवाई लेकिन सभी लोग इसी घर में मरें।

आज हम आपकों अपने इस लेख में यूएसए के एक ऐसे घर के बारें में बताएंगे जो अमेरिका सबसे डरावना घर कहा जाता है जिसका नाम है वैले हाउस। वैले हाउस जहां आज भी वैले परिवार जो कि अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी रूहें आज भी इस घर में अपना बसेरा किये हुए है। आज इस इक्‍कीसवीं शताब्‍दी जिस समय दुनिया विज्ञान के बल बुते इतना आगे हो गयी है जो कि इंसान को सबकुछ करने की शक्‍ती देती हैं। लेकिन दुनिया में एक ऐसी भी शक्‍ती है जहां इंसान और उसका विज्ञान दोनों ही घुटने देक देतें है वो है मौत, और रूहों की दुनिया।

दुनिया भर में कई लोंगों ने इन रूहों से रूबरू होने की बात को स्‍वीकार किया है लेकिन बहुत से ऐसे भी लोग है जो इन बातों में विश्‍वास नहीं करते है। ऐसे लोगों के लिए किसी ने सिर्फ एक बात कही है कि, इसे वही मान सकते है जो दुनिया में अपनी जिंदगी को होने को मानते है। मतलब यह कि जब आप खुद इनसे रूबरू होंगे तभी इन बातों पर विश्‍वास कर पायेंगे। इसके अलांवा कुछ लोग डर के कारण इन बातों पर विश्‍वास नहीं करना चाहतें है। तो आइए एक बार अमेरिका के उस वैले परिवार और उस खौफनाक घर के बारें में जानतें है।

वैले हाउस

वैले हाउस कों थामस वैले में सन 1857 में बनवाया था। वैले हाउस एक ऐसा घर था जो कि पुराने सैन डिएगों कैलिर्फोनिया में एकांत में बनवाया गया था। इस मकान को थामस वैले ने खुद डिजाइन किया था, और उस समय 10,000 डालर का खर्चा इस मकान पर किया था। वैले हाउस काफी बड़ा मकान है इसमें उस समय की आधुनिक सुख सुवधिओं की पुरी व्‍यवस्‍था की गयी थी।

वैले परिवार

वैले हाउस कों थामस वैले में सन 1857 में बनवाया था, थामस वैले का जन्‍म अमेरिका के न्‍यूयार्क शहर में सन 1823 में हुआ था। थामस कुछ दिन न्‍यूयार्क में रहकर वापस सैन डियोंगों में आकर बस गये थे और वहीं पर उन्‍होने अपने वैले हाउस का निर्माण कराया था। उस समय उनके साथ उनक पत्‍नी और तीन बच्‍चें भी इस घर में रहने के लिए आयें थे।

वैले हाउस में हादसें

वैले हाउस में हादसों की शुरूआत वैले के 18 महीने के बेटे जूनीयर थामस के मौत से हुयी। थामस अभी 18 महिने का ही हुआ था कि उसे तेज ज्‍वर ने अपने कब्‍जे में ले लिया और उसकी मौत हो गयी। आपकों बतां दे कि वैले परिवार के इस घर में आने से पहले ही थामस मानते थे कि इस घर पर रूहों का कब्‍जा है। ऐसा बताया जाता है कि जिस साल उन्‍होने इस घर को बनवाना शुरू किया था उसी वर्ष एक व्‍यक्ति ने फांसी लगाकर जान दे दी थी, और उसकी आत्‍मा आज भी मकान के इर्दगिर्द घुमती रहती है।

बेटे की मौत के बाद इस परिवार में कुछ सालों के बाद दो और बेटियों का जन्‍म हुआ। उसके कुछ सालों के बाद थामस की पत्‍नी की भी बिमारी के चलते मौत हो गयी। थामस के बडे बेटे ने वायलेट वैले ने जार्ज टी बर्टो नाम की लडकी से शादी कर ली। शादी के कुछ दिनों बाद ही दोनों में तलाक हो गया और वायलट यह सदमा वर्दाश्‍त न कर सका और उसने अपने कमरे में खुद को सीने में गोली मार कर आत्‍मत्‍या कर ली।

वहीं थामस की दूसरी बेटी अन्‍ना आलिया ने जान ट्वेल्‍थी से शादी की थी। जो कि उसी घर में रहा करता था, घर में पहले से मौजूद रूह ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था और एक एक करके थामस परिवार पर अपना कहर ढाह रही थी। इसी बीच सन जॉन की भी बिमारी के चलते मौत हो गयी। मौतों का जो ये सिलसिला शुरू हुआ तो सन 1961 तक चलता रहा और एक एक कर इस घर के सभी सदस्‍यों की मौत हो गयी।

घर में घुमतें मुर्दे

वैले हाउस जो कि अपने ही बनाने वालों की मौत की वजह बन गया इसके कारण इस मकान को कोई भी खरीदने के लिए तैयार नहीं होता था। लोगों का मानना था कि जो भी इस मकान को खरीदेगा या इसमें रहेगा उसे भी ऐ रूहें मौत दे देगी। आज भी इस मकान में थामस को उसके कमरे में चहल कदमी करते महसूस किया जाता है। सबसे खैफनाक मंजर तो वो होता है जब आलिया अपने कमरें में अपने बालों को सवांरती है, उस समय उसकी छाया साफ तौर पर आइने में देखी जा सकती है।

वहीं कुछ लोगों ने घर के पिछे वालें कमरें में अन्‍य सदस्‍यों के भी होने का आभास किया जाता है। इस घर को सरकार ने अब अपने कब्‍जे में ले लिया है। इस घर में एक घोस्‍ट हंटर्स ने अपना रिर्सच किया था। उस रिसर्च की टीम में शामिल एक व्‍यक्ति ने बताया कि जब वो इस घर में प्रवेश कर रहा था उसी समय रात के 1 बज रहे थे और चारों तरफ भयानक अधेरा था।

जब वो घर के अंदर पहले कमरे में दाखिल हुआ तो उसे लगा कि कोई महिला जो कि अपने हाथों में कुछ लिए हुए है और अन्‍दर के कमरें की दरवाजें की तरफ जा रही है। जब उस व्‍यक्ति ने उसे पुकारा तो वो पिछे मुडी उस समय उसके बालों से उसका पुरा चेहरा ढका था और हाथों में एक कंघी की जैसी कोई चीज थी। उस समय जब टीम के उस सदस्‍य ने उस पर टार्च की लाईट दी तो वो उस दरवाजें में समा गयी।

इसके अलांवा वैले हाउस में वायलट का कमरे में जब वो गया तो उसे महसूस हुआ कि कोई उसके पिछे पिछे आ रहा है और जब उसने पिछे पलट कर देखा तो वैले का पुरा परिवार उसके पिछे खडा था। इतना देखकर वो जल्‍दी से वायलट के कमरे में घुस गया जहां एक आराम कुर्सी थी जो कि अपने आप हिल रही थी। जब वो कुर्सी के पास गया तो उसने देखा की कतरे की खिड़की जिस पर शीशें लगे हुऐ थे उस शीशें कोई अंदर देख रहा था। उसी वक्‍त वो सदस्‍य दौड़कर खिड़की के पास पहुंचा तो वो साया जो कि खिडकी से झांक रही थी वो नीचे कुद गयी। उसके बाद उसने खिड़की के शीशें पर गौर किया तो उसे लगा कि शीशें पर जैसे ताजें खून के धब्‍बे लगें थे।

वैल हाउस में रहने वाले जिनकी मौत हो गयी वो अब इस दुनिया में इंसानी रूप में नही है लेकिन उनकी रूहे आज भी वैले हाउस को छोड़ नही पायी है। आप भी आज उन रूहों को आसानी से महसूस कर सकते है। बस जरूरत है थोडे से हिम्‍मत और इच्‍छा की। वैले हाउस को सरकार ने एक म्‍यूजीयम के तौर पर शुरू कर दिया है। आज बहुत से लोग वैले हाउस में जाकर थामस वैले के परिवार को महसूस करतें है। लेकिन सरकार ने मकान के कुछ हिस्‍सों को प्रतिबंधित कर दिया है।

किला जहां सूरज ढलते ही जाग जाती हैं आत्‍माएं..!!



पुराने किले, मौत, हादसों, अतीत और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और संयोग होता है। ऐसी कोई जगह जहां मौत का साया बनकर रूहें घुमती हो उन जगहों पर इंसान अपने डर पर काबू नहीं कर पाता है और एक अजीब दुनिया के सामने जिसके बारें में उसे कोई अंदाजा नहीं होता है, अपने घुटने टेक देता है। दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले है जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत है और वहां आज भी रूहों का वास है। दुनिया में ऐसी जगहों के बारें में लोग जानते है, लेकिन बहुत कम ही लोग होते हैं, जो इनसे रूबरू होने की हिम्‍मत रखतें है। जैसे हम दुनिया में अपने होने या ना होने की बात पर विश्‍वास करतें हैं वैसे ही हमारे दिमाग के एक कोने में इन रूहों की दुनिया के होने का भी आभास होता है। ये दीगर बात है कि कई लोग दुनिया के सामने इस मानने से इनकार करते हों, लेकिन अपने तर्कों से आप सिर्फ अपने दिल को तसल्‍ली दे सकते हैं, दुनिया की हकीकत को नहीं बदल सकते है। कुछ ऐसा ही एक किलें के बारे में आपको बताउंगा जो क‍ि अपने सीने में एक शानदार बनावट के साथ-साथ एक बेहतरीन अतीत भी छुपाए हुए है। अभी तक आपने इस सीरीज के लेखों में केवल विदेश के भयानक और डरावनी जगहों के बारें में पढ़ा है, लेकिन आज आपको अपने ही देश यानी की भारत के एक ऐसे डरावने किले के बारे में बताया जायेगा, जहां सूरज डूबते ही रूहों का कब्‍जा हो जाता है और शुरू हो जाता है मौत का तांडव। राजस्‍थान के दिल जयपुर में स्थित इस किले को भानगड़ के किले के नाम से जाना जाता है। तो आइये इस लेख के माध्‍यम से भानगड़ किले की रोमांचकारी सैर पर निकलते हैं। भानगड़ किला एक शानदार अतीत के आगोश में भानगड़ किला सत्रहवीं शताब्‍दी में बनवाया गया था। इस किले का निर्माण मान सिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने करावाया था। राजा माधो सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे। उस समय भानगड़ की जनसंख्‍या तकरीबन 10,000 थी। भानगढ़ अल्‍वार जिले में स्थित एक शानदार किला है जो कि बहुत ही विशाल आकार में तैयार किया गया है। चारो तरफ से पहाड़ों से घिरे इस किले में बेहतरीन शिल्‍पकलाओ का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा इस किले में भगवान शिव, हनुमान आदी के बेहतरीन और अति प्राचिन मंदिर विध्‍यमान है। इस किले में कुल पांच द्वार हैं और साथ साथ एक मुख्‍य दीवार है। इस किले में दृण और मजबूत पत्‍थरों का प्रयोग किया गया है जो अति प्राचिन काल से अपने यथा स्थिती में पड़े हुये है।

भानगड़ किला जो देखने में जितना शानदार है उसका अतीत उतना ही भयानक है। आपको बता दें कि भानगड़ किले के बारें में प्रसिद्व एक कहानी के अनुसार भागगड़ की राजकुमारी रत्‍नावती जो कि नाम के ही अनुरूप बेहद खुबसुरत थी। उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्‍य में थी और साथ देश कोने कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्‍छुक थे। उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष ही थी और उनका यौवन उनके रूप में और निखार ला चुका था। उस समय कई राज्‍यो से उनके लिए विवाह के प्रस्‍ताव आ रहे थे। उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार में निकती थीं। राजकुमारी रत्‍नावती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी। उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी एक सिंघीया नाम व्‍यक्ति खड़ा होकर उन्‍हे बहुत ही गौर से देख रहा था। सिंघीया उसी राज्‍य में रहता था और वो काले जादू का महारथी था। ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दिवाना था और उनसे प्रगाण प्रेम करता था। वो किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था। इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र के बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था।


राजकुमारी रत्‍नावती ने उस इत्र के बोतल को उठाया, लेकिन उसे वही पास के एक पत्‍थर पर पटक दिया। पत्‍थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गया और सारा इत्र उस पत्‍थर पर बिखर गया। इसके बाद से ही वो पत्‍थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंघीया के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुलद दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी। मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्‍द ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्‍म नहीं ले सकेंगे और ताउम्र उनकी आत्‍माएं इस किले में भटकती रहेंगी। उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगडं और अजबगढ़ के बीच युद्व हुआ जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये। यहां तक की राजकुमारी रत्‍नावती भी उस शाप से नहीं बच सकी और उनकी भी मौत हो गयी। एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्‍लेआम के बाद वहां मौत की चींखें गूंज गयी और आज भी उस किले में उनकी रू‍हें घुमती हैं।

किलें में सूर्यास्‍त के बाद प्रवेश निषेध फिलहाल इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है। किले के चारों तरफ आर्कियोंलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) की टीम मौजूद रहती हैं। एएसआई ने सख्‍त हिदायत दे रखा है कि सूर्यास्‍त के बाद इस इलाके किसी भी व्‍यक्ति के रूकने के लिए मनाही है। इस किले में जो भी सूर्यास्‍त के बाद गया वो कभी भी वापस नहीं आया है। कई बार लोगों को रूहों ने परेशान किया है और कुछ लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है।

किलें में रूहों का कब्‍जा इस किले में कत्‍लेआम किये गये लोगों की रूहें आज भी भटकती हैं। कई बार इस समस्‍या से रूबरू हुआ गया है। एक बार भारतीय सरकार ने अर्धसैनिक बलों की एक टुकड़ी यहां लगायी थी ताकि इस बात की सच्‍चाई को जाना जा सकें, लेकिन वो भी असफल रही कई सैनिकों ने रूहों के इस इलाके में होने की पुष्ठि की थी। इस किले में आज भी जब आप अकेलें होंगे तो तलवारों की टनकार और लोगों की चींख को महसूस कर सकतें है। इसके अलांवा इस किले भीतर कमरों में महिलाओं के रोने या फिर चुडि़यों के खनकने की भी आवाजें साफ सुनी जा सकती है। किले के पिछले हिस्‍सें में जहां एक छोटा सा दरवाजा है उस दरवाजें के पास बहुत ही अंधेरा रहता है कई बार वहां किसी के बात करने या एक विशेष प्रकार के गंध को महसूस किया गया है। वहीं किले में शाम के वक्‍त बहुत ही सन्‍नाटा रहता है और अचानक ही किसी के चिखने की भयानक आवाज इस किलें में गुंज जाती है। आपको यह आर्टिकल कैसा लगा कमेंट बॉक्‍स में अपने विचार जरूर दें।

Saturday, 17 September 2011

सोने का शहर


रावण की सोने की लंका के बारे में तमाम कहानियां सुनी होगी, वहीं पूरी दुनिया में एक ऐसी मिथकीय जगह की तमाम कहानियां फैली हैं, जहां चारों आ॓र सोना ही सोना बिखरा है। इस जगह को नाम दिया गया है ‘अल डोराडो’ स्पेनी भाषा में सोने से बना या मढ़ा हुआ। सैकड़ों वर्षों से लोग इस जगह की खोज में लगे रहे हैं। कुछ ने तो अपनी पूरी जिंदगी इस जगह को खोजने में लगा दी। कहते हैं अल डोराडो की कथा उस कहानी से शुरू हुई जिसमें कहा गया था कि एक दक्षिण अमेरिकी कबीले का मुखिया स्वयं को सोने की धूल से लपेट लेता था, उसे देख ऐसा प्रतीत होता था मानो वे सोने का ही बना हो। १५३० के आसपास आज के कोलंबिया में स्पेनी आक्रमणकारी गोन्जालो जिमेनेज डे केसाडा ने १५३७ में म्युस्का (आज के कोलंबिया का कनडीनामार्का तथा बोयाका पहाड़ी क्षेत्र) में यहां की पुरानी परंपरा देखी। इसी परंपरा को देखने के बाद अल डोराडो (सुनहरा आदमी) अल इण्डियो डोराडो (दी गोल्डेन इंडियन), अल रे डोराडो (दी गोल्डेन किंग) आदि मिथक तेजी से सामने आये व अल डोराडो गोल्डेन किंग का राज्य था फिर शहर के रूप में जाना जाने लगा। इसी मशहूर सोने के शहर की तलाश में १५४१ में स्पेनी खोजी फ्रांसिस्को आ॓रीलाना तथा गोन्जालो पिजारे दक्षिण अमेरिका की आ॓र चल पड़े।

एक अन्य स्पेनी जुआन रोड्रिगे फ्रेयाइल ने एक लेख ‘अल कारनेरो’ में लिखा है कि म्युस्किा का मुख्य पादरी या सम्राट को एक धार्मिक अनुष्ठान के चलते सोने की धूल से पूरी तरह ढक दिया जाता था यानी उसके पूरे शरीर में सोने की धूल मल दी जाती थी व यह धार्मिक अनुष्ठान गुआटाविटा झील (आज के शहर बोगोटा के निकट) के पास हुआ था। 1636 में जुआन रोड्रिगे फ्रेयाइल ने अपने गवर्नर दोस्त डॉन जुआन को पत्र में लिखा ‘नये राजा के राज्याभिषेक के मौके पर यह अनुष्ठान हुआ। गद्दी पर बैठने से पहले राजा ने कुछ समय एकांत में गुफा में बिताया जहां उसके आसपास स्रियां भी नहीं थी, न उसको नमक का प्रयोग करना था न ही मिर्च आदि का न ही सूर्य की रोशनी में गुफा से बाहर आना था, पहले उसे विशाल गुआटाविटा झील तक ले जाया गया ताकि वे उस शैतान को भेट चढ़ा सके व बलि दे सके जिसे वह अपना देवता या भगवान मानते हैं। अनुष्ठान के दौरान सेवकों ने जलबेंत (सरपत) से नौका तैयार की, जिसे कीमती व सुंदर चीजों से सजाया गया। इसमें अंगीठी भी रखी गयी व इसमें खुशबूदार धूपबत्ती जला दी गयी। झील काफी बड़ी व गहरी थी व इसमें विशाल जहाज भी तैर सकता था। तट पर भी कई अंगीठियां जलायी गयी ताकि धुएं से दिन की रोशनी छुप जाये। इसके बाद राजा के कपड़े उतार उसके शरीर पर कोई चिपचिपा पदार्थ लगाया गया फिर शरीर पर सोने का चूर्ण लगाया गया जिससे राजा का पूरा शरीर ढक गया। इसके उपरान्त राजा को नाव में बिठाया गया व राजा के पावों के पास सोने व पन्नों के ढेर रखे गये ताकि वह इन्हें अपने देवता को चढ़ा सके। राजा के साथ नाव में उसके चार प्रमुख मंत्री भी थे जो परो, मुकुट, कड़ों व हारों से लदे थे। यह सभी आभूषण सोने के बने थे। यह चारों भी नग्न थे व जैसे ही नाव झील के बीच में पहुंची सभी ने स्वर्ण को झील में फेंक दिया। फिर नाव तट तक आयी और ढोल, नगाड़े बजने लगे व इसी के साथ इन लोगों को नया राजा मिल गया।

ऐसा माना जाता है कि म्यूसिका में झील के आसपास कई कबीले ऐसे अनुष्ठान करते होंगे। म्यूसिका व इसके जैसे अन्य शहरों व प्रांतों के बारे में जब स्पेनी आक्रमणकारियों ने सुना तो वे हजारों मील की समुद्री यात्रा कर यहां आ धमके। यहां उन्हें राजा व अन्य रईसों के पास से काफी सोना वगैरह तो मिला पर न उन्हें सोने से बने ऐसे शहर दिखे जहां मकान ही सोने से बने हों न ही ऐसी सोने की खदानें जहां सोना भरा हो, क्योंकि इन प्रांतों में सोना व्यापार से कमाया गया था। इसके बाद स्पेनियों का विश्वास अल डोराडो पर एक बार फिर से जम गया क्योंकि अल डोराडो की कहानियां उन लोगों से सुनने लगे, जिन्हें इन्होंने बंदी बनाया था। 1580 के आसपास तो स्पेनियों ने सोना पाने की चाह में पूरी झील का पानी पहाड़ी को काटकर दूसरी आ॓र निकाल देने की भी सोची। इस प्रयास के चक्कर में पहाड़ी का काटा गया हिस्सा आज भी देखा जा सकता है। जल्द ही अल डोराडो के मिथक में तमाम अन्य किस्से भी जुड़े व कई सौ वर्षों तक लोग यह मानते रहे कि एक ऐसा शहर है, जहां हजारों हजार टन सोना है। अल डोराडो की खोज में सबसे प्रसिद्ध नाम है, फ्रांसिस्को डी आ॓रीलाना तथा गोन्जालो पिजारो (1541) का जो सोने के लालच में दक्षिण अमेरिका आए। अन्य मशहूर लोग जो सोना पाने की चाह में यहां पहुंचे वे थे फिलिप वॉन हट्टन (1541-45) जो वेनेजुएला पहुंचा तथा गोन्जालो जिमेनेज डी केसाडा जो 1549 में आया। सर वाल्टर रेले, जिन्होंने 1595 में पुन: खोज शुरू की, ने अल डोराडो को ऐसा शहर बताया है जो गुईआना में आ॓रीनोको तक फैला था। इस शहर को अंग्रेजों द्वारा बनाये नक्शों में भी दिखाया जाने लगा। बाद में इन्हें मिथकीय मानकर इनका नामोनिशान नक्शे से मिटा दिया गया। हद तो यह है कि एक सैनिक ने यह बात तक उड़ा दी कि 1531 में जहाज के डूबने के बाद उसे अलडोराडो नाम के शहर के लोगों ने ही बचाया और इस शहर में रखा भी।
आज अल डोराडो उस शहर को कह देते हैं जहां पर काफी सम्पन्नता है। मशहूर कवि मिल्टन ने ‘पेराडाइज लास्ट’ में इसका जिक्र किया है। आज ‘होली ग्रेल’ (जीसस का पवित्र प्याला), पारस पत्थर आदि की तरह अल डोराडो भी किस्सों का हिस्सा भर रह गया है क्योंकि लाखों प्रयास के बाद भी ऐसा कोई शहर नहीं मिलता जहां चारों आ॓र हर चीज सोने की बनी हो।