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Sunday, 28 September 2014

याद..!!

रेन में घुसते ही आज नोना को पता नहीं क्या हुआ, तेज तेज रोना शुरू कर दिया !

दो साल की बच्ची को समझाएँ भी तो कैसे ? माँ ने बहुत कोशिश की उसे सुलाने की पर पता नहीं आज क्या बात थी कि वह पिता की गोदी छोड़ने को तैयार नहीं! माँ गोद में लेकर बैठे तो फिर और तेज रोना शुरू! और माँ ट्रेन की गैलरी में टहले वह कुछ सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं था।

आखिरकार पिता ने बेटी को कंधे से लगाया और थपकी देते हुए टहलना शुरू किया ! हल्का सा गुनगुनाने लगे ! यात्री मंद मंद मुस्कुरा रहे थे, महिलाएँ कुछ भावुक हो उठीं! नोना थोड़ी देर बाद चुप हो गई, धीरे से पिता के कंधे पर सिर टिका दिया, आँखें रुक रुक कर बंद कीं और थोड़ी ही देर में मीठे सपनो में खो गयी !

आश्वस्त माँ, पिता की गोद से बच्ची को लेने के लिये उठी तो पिता की आँखे भीगी हुई थी !
माँ ने बच्ची को लेकर सीने से सटाया और पति की आँखों में आँखे डालकर शरारत से पूछा !
"बेटी पर इतना प्यार आया कि मोती बरस पड़े?"
"नहीं, बस, आज पता नहीं क्यों बाबूजी याद आ गए।"

Tuesday, 23 September 2014

इच्छा..!!

हूँ...., आज माँ ने फिर से बैंगन की सब्जी बना कर डिब्बे में डाल दी। मुझे माँ पर गुस्सा आ रहा था ।  कितनी बार कहा है कि मुझे ये सब्जी पसंद नहीं, मत बनाया करो।

कालेज की कैंटीन में अपना टिफिन खोलते हुए, मैं यही सोच रहा था कि तभी मेरी नजर सामने सडक़ के पार पड़ी।

एक बूढ़ा व्यक्ति कूड़े के ढेर से कुछ निकाल कर खाता हुआ दिखाई दिया। मेरी नजरें खुद-ब- खुद झुक गई, मुझे अपनी सब्जी अब बिल्कुल भी बुरी नहीं लग रही थी।

- रंजीत सिंह


नौकरी..!!


रोज की तरह दफ़्तर जाते समय जब मैं मालरोड पहुंचा तो लोगों की भारी भीड़ देख ठिठक गया। नजदीक जा कर देखा तो एक सिपाही और कुछ व्यक्ति खून से लथपथ हुए एक व्यक्ति को हाथों पैरों से उठा कर एक तरफ कर रहे थे।

"ये तो खत्म हो गया लगता है ।" एक बूढ़ी औरत कह रही थी।
"सिर पर गहरी चोट लगी है शायद। कसूर इसका ही था, मैंने खुद देखा है, भला-चंगा जा रहा था, बस भी तेज नहीं थी, इसने अपनी साइकिल अचानक बस की ओर घुमा दी थी।" पास खड़ा एक और व्यक्ति बोला।

"अरे यार ये तो दीवान है, अपने दफ़्तर का फोरमैन, इसने तो परसों रिटायर होना था, यह तो बहुत बुरा हुआ। अभी तो इसके लडक़े भी कुंवारे हैं ।" पास में खड़े मेरे दोस्त के मुंह से दीवान का नाम सुन कर मैं जैसे सुन्न हो गया।

मुझे याद आया, अभी परसों शाम तो ये घर आया था, अपने बेटे की नौकरी की बात कर रहा था। मैंने उसे बताया था कि डिपार्टमैंट की तरफ से लडक़े को देने का कोटा खत्म कर दिया गया है। बस मौत हो जाने की सूरत में ही एक बच्चे को नौकरी मिल सकती है।

मेरी बात सुन कर वो उठा और चला गया था। उसके चेहरे की उस अन्जानी सी खुशी का राज मुझे अब समझ आ रहा था।

- रंजीत सिंह

Sunday, 24 November 2013

कंचे..!!


एक लड़का और लड़की साथ में खेल रहे थे. लड़के के पास बहुत सुंदर कंचे थे. लड़की के पास कुछ टॉफियां थीं.


लड़के ने लड़की से कहा कि वह टॉफियों के बदले में अपने सारे कंचे लड़की को दे देगा. लड़की मान गई.


लेकिन लड़के ने चुपके से सबसे खूबसूरत दो-तीन कंचे दबा लिए और बाकी कंचे लड़की को दे दिए. बदले में लड़की ने अपनी सारी टॉफियां लड़के को दे दीं.


उस रात लड़की कंचों को निहारते हुए खुशी से सोई. लेकिन लड़का इसी सोच में डूबा रहा कि कहीं लड़की ने भी चालाकी करके उससे कुछ टॉफियां तो नहीं छुपा लीं!

Sunday, 7 July 2013

सिकंदर को महान क्यों कहते हैं..!!



सिकन्दर यूनानी प्रायद्वीप के छोटे से देश मकदूनिया का राजा था। उसका जन्म 356 ईपू हुआ था। वह प्रसिद्ध विचारक सुकरात का शिष्य था। युरोप से शुरू करके एशिया माइनर, फारस, मिस्र और फिर भारत तक लड़ाइयाँ जीतकर वह एक अर्थ में पहला विश्व विजेता था। वह बेहद महत्वाकांक्षी था और दुनिया के अंत तक पहुँचना चाहता था। उसे महान बनाने वाली दो-तीन बातें हैं। एक, वह अपने सैनिकों के आगे खुद रहकर लड़ाई लड़ता था। दूसरे, जिस राज्य पर विजय पाता था, कोशिश करके उसे ही अपना राज-पाट चलाने देता था, सिर्फ अपनी अधीनता स्वीकार कराता था। उसका युद्ध कौशल आज भी दुनियाभर की सेनाओं के कोर्स में शामिल है। सबसे बड़ी बात यह कि वह 33 साल की उम्र में दुनिया से विदा हो गया। इतनी कम उम्र में इतनी उपलब्धियों के साथ..!!

Tuesday, 29 November 2011

महगाई


रघुवीर अपने बीमार बच्चे के लिए फल खरीदने के लिए आया था। फलों के बढ़े हुए दाम सुनकर मन ही मन सोच रहा था, ‘क्या लूं और क्या न लूं? लूं भी कुछ या न लूं? लेना तो पड़ेगा थोड़ा बहुत शंकर के लिए। कितनी महंगाई हो गई है? फलों के दाम भी कहां से कहां पहुंच गए हैं?’

तभी एक अमीर महिला कार से उतरी। उसने बिना दाम पूछे एक किलो बढ़िया सेब और एक दर्ज़न बढ़िया केले खरीदे और पांच सौ रुपए का नोट निकालकर दुकानदार को पकड़ा दिया। दुकानदार ने चार सौ और कुछ रुपए उसे वापस कर दिए। रुपए वापस मिलते देख बरबस ही उस महिला के मुंह से निकला, ‘फ्रू ट तो सस्ते ही चल रहे हैं।’

यह सुनकर रघुवीर ने उस औरत की तरफ देखा। उसे लगा कि महंगाई नहीं बढ़ी है, सिर्फ उसी के पास रुपए नहीं है। जिसके पास रुपए हैं, उसके लिए कोई महंगाई नहीं है।
..वह वहीं खड़ा था और वह महिला जा चुकी थी।