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Monday, 10 February 2014

Rahat Indori Collection 1



Har ek chehare ko zakhmon ka aina na kaho
Ye zindagi to hai rahamat ise saza na kaho
Na jane kaun si majaburiyon ka qaidi ho
Wo sath chor gaya hai to bewafa na kaho

Tamam shahar ne nezon pe kyun uchala mujhe
Ye ittefaq tha tum is ko hadasa na kaho

Ye aur bat ke dushman hua hai aj magar
Wo mera dost tha kal tak use bura na kaho

Hamare aib hamay ungaliyon pe ginwao
Hamari pith ke piche hamay bura na kaho

Main waqiyat ki zanjir ka nahi qayal
Mujhe bhi apane gunahon ka silsila na kaho

Ye shahar wo hai jahan rakshas bhi hai quot;rahat quot;
Har ek tarashe huye but ko dewata na kaho..!!

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Wafa Ko Aazmana Chahiye Tha Hamara Dil Dukhana Chahiye Tha
Aana Na Aana Meri Marzi Hai Tumko To Bulana Chahiye Tha

Hamari Khwahish Ek Ghar Ki Thi Use Sara Zamaana Chahiye Tha
Meri Aankhe Kaha Nam Hui Thi Samundar Ko Bahana Chahiye Tha

Jaha Par Panhuchna Main Chahta Hoon Waha Pe Panhuch Jana Chahiye Tha
Hamara Zakhm Purana Bahut Hai Chargar Bhi Purana Chahiye Tha

Mujhse Pahle Wo Kisi Aur Ki Thi Magar Kuch Shayrana Chahiye Tha
Chalo Mana Ye Choti Baat Hai Par Tumhe Sab Kuch Batana Chahiye Tha

Tera Bhi Shaher Me Koi Nahi Tha Mujhe Bhi Ek Thikana Chahiye Tha
Ke Kis Ko Kis Tarah Se Bhoolte Hain Tumhe Mujhko Sikhana Chahiye Tha

Aisa Lagta Hai Lahoo Mein Humko Kalam Ko Bhi Dubana Chahiye Tha
Ab Mere Saath Rah Ke Tanz Na Kar Tujhe Jana Tha Jana Chahiye Tha

Kya Bas Maine Hi Ki Hai Bewafaai Jo Bhi Sach Hai Batana Chahiye Tha
Meri Barbadi Pe Wo Chahta Hai Mujhe Bhi Muskurana Chahiye Tha

Bas Ek Tu Hi Mere Saath Mein Hai Tujhe Bhi Rooth Jana Chahiye Tha
Humare Paas Jo Ye Fan Hai Miya Hume Is Se Kamana Chahiye Tha

Ab Ye Taaj Kis Kaam Ka Hai Hume Sar Ko Bachana Chahiye Tha
Usi Ko Yaad Rakha Umar Bhar Ke Jisko Bhool Jana Chahiye Tha

Mujhse Baat Bhi Karni Thi Usko Gale Se Bhi Lagana Chahiye Tha
Usne Pyaar Se Bulaya Tha Hume Mar Ke Bhi Aana Chahiye Tha

Tumhe Use Pane Ke Khatir Kabhi Khud Ko Gawana Chahiye Tha..!!

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Masjidon ke sahan tak jana bahut dushwar tha
Der se nikala to mere raste may dar tha

Apane hi phailao ke nashe may khoya tha darakht
Aur har masum tahani par phalon ka bar tha

Dekhate hi dekhate shaharon ki raunaq ban gaya
Kal yahi chehara tha jo har aine pe bar tha

Sab ke dukh sukh us ke chehare pe likhe paye gaye
Adami kya tha hamare shahar ka akhabar tha

Ab mohalle bhar ke darawazon pe dastak hai nasib
Ek zamana tha ke jab main bhi bahut khuddar tha

Kagazon ki sab siyahi barishon may dhul gai
Ham ne jo socha tere bare may sab bekar tha..!!

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Kabhi akaile ma mil kar jhanjhoR doon ga usse
Jahan jahan se wo toota hai joR doon ga usse

Mujhe choR gaya ye kamaal hai us ka
Iraada ma ne kiya tha ke choR doon ga usse

Paseene baant'ta phirta hai har taraf sooraj
Kabhi jo haath laga to nichoR doon ga usse

Maza chakha ke hi maana hoon ma bhi dunya ko
Samajh rahi thi ke aise hi choR doon ga usse

Bacha ke rakhta hai khud ko wo mujh se shseesha badan
Usse ye dar hai ke toR phoR doon ga usse..!!

चाँदनी को क्या हुआ कि आग बरसाने लगी..!!


चाँदनी को क्या हुआ कि आग बरसाने लगी
झुरमुटों को छोड़कर चिड़िया कहीं जाने लगी

पेड़ अब सहमे हुए हैं देखकर कुल्हाड़ियाँ
आज तो छाया भी उनकी डर से घबराने लगी

जिस नदी के तीर पर बैठा किए थे हम कभी
उस नदी की हर लहर अब तो सितम ढाने लगी

वादियों में जान का ख़तरा बढ़ा जब से बहुत
अब तो वहाँ पुरवाई भी जाने से कतराने लगी

जिस जगह चौपाल सजती थी अंधेरा है वहाँ
इसलिए कि मौत बनकर रात जो आने लगी

जिस जगह कभी किलकारियों का था हुजूम
आज देखो उस जगह भी मुर्दनी छाने लगी..!!

Thursday, 1 August 2013

Suno… Mujhe Rona Nahi Aata..!!



Mujhe Rona Nhi Aata.
Mujhe Khona Nhi Aata.
K Tum Bin Jeena Mushkil Hai.
Jo Dard Tum Dena Chahte Ho Mujhe Sehna Nhi Aata.

Tum To Reh Lo Ge Saath Kisi Aur K Mgr.
Main Kya Krun K Mujhe RASTA Badalna B Nhi Aata.

Tum To Waaqif Ho Andaz.E.Guftugu K.
Mujhe To Baat Krne Ka Salika B Nhi Aata.

Tum To Jeet Jate Ho Larr Jhagar Kar B.
Dekho Mujhe To Larna B Nhi Aata.

Tum To Khush Reh Lo Ge Mere Bin.
Dekho Tumhare Bin To Mujhe Jeena B Nhi Aata..!!

Monday, 10 June 2013

फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं..!!



मुझको तुझसे रंज नहीं है,
तुझको मुझसे द्वेष नहीं!
फिर हम क्यों लङते रहते हैं?
जब किंचित भी क्लेश नहीं!!

मेरी पीङा – तेरे आँसू,
तेरा सुख – मेरी मुस्कान|
तेरी राहें – मेरी मंजिल,
मेरा दिल – तेरे अरमान|
मेरा घर – तेरा चौबारा,
तेरा कूचा – मेरी शान|
दौनों ही कहते रहते हैं,
मानव – मानव एक समान|

फिर हम कैसे प्रुथक् हुए?
जब मत मैं अन्तर लेश नहीं!
फिर हम क्यों लङते रहते हैं?
जब किंचित भी क्लेश नहीं!!

कौन सनातन है? प्यारे -
इस मुद्दे मैं कुछ जान नहीं|
पारस्परिक समन्वय से,
हम दौनों ही अनजान नहीं|
क्या तुझको – क्या मुझको,
वो सब पहली बातें ध्यान नहीं?
दौनों जानें, कुछ इक बातें,
होती कभी समान नहीं|

कया फिजूल बातों से,
तेरे दिल को पहुंचे ठेस नहीं?
फिर हम क्यों लङते रहते हैं?
जब किंचित भी क्लेश नहीं!!

आ, पल भर मिल बैठ जरा,
सुन ले मन की बातें मेरी|
खुदगर्जों का बहिष्कार कर,
बात सुनूंगा मैं तेरी|
सुलझा लें गुत्थी,
सदियों से,
अनसुलझी हैं बहुतेरी|
आज नहीं, तो कभी नहीं,
कल फिर हो जायेगी देरी|

क्या तेरे आराध्य देव का,
एक नाम, ‘अखिलेश’ नहीं?
फिर हम क्यों लङते रहते हैं?
जब किंचित भी क्लेश नहीं!!

अब न आयेगी बेटियां..!!



बेटियों पे कब तलक बस यूँ ही लिखते जाओगे,
कब हकीकत की जमीं पर आ के उन्हें बचाओगे…

क्यों नहीं उठते हाथ और क्यों न करते सर कलम,
और कितनी दामिनीयों के लिए मोमबतियां जलाओगे…

आज कहते हो की प्यारी होती है सब बेटियां,
खुद मगर कब बेटों की चाह से निजात पाओगे…

जानवर से इंसान बना और फिर भी रहा जानवर,
जिस्म मानव का है पर कब इंसानी रूह लाओगे…

छु रही है आसमां आज की सब लड़कियां,
इस जमीं को कब उसके चलने लायक बनाओगे…

देखो क्या उसूल है मुजरिम की भी होती पैरवी ,
ऐसे माहौल में तो बस मुजरिम बढ़ाते जाओगे…

निकली थी बेख़ौफ़ सी घर से वोह जीने जिंदगी,
लुट गयी अब कैसे उसे जीने की राह दिखाओगे…

अपनी बेटी बेटी है, औरों  की बेटी माल है,
कब तलक ये दोहरा चेहरा अपनों से छुपाओगे…

अब न आयेगी कभी इस जमीं पर बेटियां,
अपनेपन ममता को एक दिन तरस जाओगे..!!

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में..!!



मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग

रोज़ मैं चांद बन के आता हूँ
दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ

खनखनाता हूँ माँ के गहनों में
हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में

मैं ही मज़दूर के पसीने में
मैं ही बरसात के महीने में

मेरी तस्वीर आँख का आँसू
मेरी तहरीर जिस्म का जादू

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते नहीं जब लोग

मैं ज़मीनों को बे-ज़िया करके
आसमानों में लौट जाता हूँ

मैं ख़ुदा बन के क़हर ढाता हूँ..!!

अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला..!!



अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला

उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

दूर के चांद को ढूंढ़ो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आंगन में समाने वाला

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला..!!

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है..!!



इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है..!!

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए..!!



हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए..!!

बदल बदल के भी दुनिया को हम बदलते क्या..!!


बदल बदल के भी दुनिया को हम बदलते क्या
गढ़े हुये थे जो मुर्दे वो उठ के चलते क्या

डगर दिखाने गये थे नगर जला आये
हवस के शोले दियों की तरह से जलते क्या

तरक़्क़ियों के के तमाशों ने मार डाला हमें
अनाज़ उगता नहीं ख़ाक ही निगलते क्या

हलाल हो के भी हमसे यक़ीन छूटा नहीं
झुलस चुका था जो तन उस से बाल उचलते क्या

हरिक सवाल ज़रूरी हरिक ज़वाब अहम
“हम आ चुके थे क़रीब इतने बच निकलते क्या”..!!

Thursday, 6 June 2013



परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता

बड़े लोगों से मिलने में में हमेशा फासला रखना
जहां दरिया समंदर में मिला, दरिया नहीं रहता

तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज़ वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता

मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता ..!!

Wednesday, 5 June 2013

साथी, सब कुछ सहना होगा..!!



मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है..!!



है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था ,
भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनो हथेली,
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बातसे मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता पर समय की मुसकुराना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिसमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबरअवनि को मत्तता के गीत गागा,
अन्त उनका हो गया तो मन बहलने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय वे साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आए,
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,
किन्तु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है..!!

Saturday, 25 May 2013

कब उसको भूल गए ये भी तो पता ना लगा..!!



वो बे-हिसी के दिन आये की कुछ हुआ ना लगा
कब उसको भूल गए ये भी तो पता ना लगा

बिछुड़ते वक़्त दिलासे ना खोखले वादे
वो पहली बार मुझे आज बे-वफ़ा ना लगा

जहां पे दस्तकें पहचान कर जवाब मिले
गुज़र भी ऐसे मकान से हो तो सदा ना लगा

ये देखने का सलीका भी किसको आता है
की उसने देखा मुझे और देखता ना लगा

वसीम अपने गिरेबान में झाँक कर देखा
तो अपने चारों तरफ कोई भी बुरा ना लगा..!!

Thursday, 23 May 2013

कुछ ख्वाहिशो के पंख..!!



कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो
इस डूबते हुआ तिनके को सहरा दे दो
कोई मेरी डूबती को कश्ती किनारा दे दो
मुझे भी कोई पतवार और माझी भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो

मै नन्हे पैरो से कितनी दूर चल पाउगा
गिरते , उठते कब तक संभल पाउगा
कोई थामने वाले हाथ मुझे भी दे दो
कोई अपना साया और साथ भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो ……

आस्मां को देखकर कब तक सो जाउगा
तारो मै कब तक अपनों को देखता जाउगा
कुछ परियो के कहानिया मुझे भी दे दो
टूटा तारो वाली किस्मत मुझे भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो..!!

Saturday, 18 May 2013

दिल में इक हौंसला सा है कि कोई मेरे साथ तो है..!!



गम कुछ कम नहीं हुए तुझसे मिलने के बाद मगर!
दिल में इक हौंसला सा है कि कोई मेरे साथ तो है!!

कांटे मेरी राहों के हरसूरत मेरे हिस्से में ही आयेंगे!
गर इक गुल है मेरे साथ तो जरूर कोई बात तो है!!

मुझे आज तक जो भी मिला,मशक्कत से मिला!
तुझ से मिलने में मेरी तकदीर का कुछ हाथ तो है!!

अंधेरे कहां समझते हैं भला मशाल के जलने का दर्द!
वजह कोई भी हो हर सूरत में दोनों की मात तो है!!

डूबने वाले के लिये फ़र्क नहीं मंझधार और किनारे में!
बेबसी का सबब जिन्दगी के उलझे हुये हालात ही तो हैं!!

गम कुछ कम नहीं हुए तुझसे मिलने के बाद मगर!
दिल में इक हौंसला सा है कि कोई मेरे साथ तो है..!!

आओ कुछ बात करे, हम तन्हा कय़ों है..!!



आओ कुछ बात करे, हम तन्हा कय़ों है?
आओ कुछ दिल की कहे, हम तन्हा कय़ों है?
कोई बस इतना बता दे, हम तन्हा कय़ों है?
कोई तो मुझको सदा दे, हम तन्हा कय़ों है?

रोज़ मिलती है मुझे, ये कोई अजनबी जैसे,
रूठी हुई है मुझसे, मेरी परछाई ऐसे,
कोई समेटो ज़रा, कोई तो बुला दो इसको,
मुझसे थोडी बहुत पह्चान करा दो इसको,

आओ हाथ थामो मेरा, हम तन्हा कय़ों है?
दिल की धड्कन का शोर कभी सुनता नही,
खवाब भी आखों मे अब कोई पलता नही,
आईना है मगर इसमें कुछ नज़र आता नही,

खाली घर का खालीपन कुछ भाता नही,
मुझको खुद से मुलाकात करा दे ऎ-खुदा,
कोई तो मुझको दुआ दे, हम तन्हा कय़ों है..!!

कहने को तो हम, खुश अब भी हैं..!!



कहने को तो हम, खुश अब भी हैं
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं

रूठने-मनाने के इस खेल में, हार गए हैं हम
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं

मेरी ख़ता बस इतनी है, तुम्हारा साथ चाहता हूँ
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं

मुझसे रूठ के दूर हो, पर एहसास तो करो
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं

इस इंतज़ार में मेरा क्या होगा, तुम फिक्र मत करना
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं

बस थोड़ा रूठने के अंजाम से डरते हैं
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं

हमारी तमन्ना कुछ ज़्यादा नहीं थी, जो पूरी न होती
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं

चलते हैं तीर दिल पे कितने, जब तुम रूठ जाते हो
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं

मेरी मासूमियत को तुम, ख़ता समझ बैठे हो
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं

आप हमसे रूठा न करें, बस यही इल्तिजा है
फ़रियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं

तुम हो किस हाल में, कम से कम ये तो बता दो
बेखब़र हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं..!!

Koi Aisa Shaks Bhi Hua Kare..!!


Koi Aisa Shaks Bhi Hua Kare,
Meri Dhadkano Ko Suna Kare..

Mein Ye Zindgi Us Pe Waar Du,
Wo Jo Khuloos-e-Dil Se Wafa Kare..

Mere Qarb Ko Wo Samjh Sake,
Mere Dard Ki Wo Dawa Kare..

Mujhe Us Se ISHQ Pe Naaz Ho,
Wo Jo Talab Mein Meri Raha Kare..

Meri LAAJ Uska Gharoor Ho,
Meri Aabroo Ka wo Difa Kare..

Kare Mosamon Ke Azaab Mein Wo,
Bahaar Ban K Mila Kare..

Jo Zubaan Meri Khamosh Ho,
To Mere Dil Mein Jhaank Wo Liya Kare..

Mera Dukh Us Ka Bhi Dard Ho,
Mere Saath Wo Bhi Jala Kare..

Koi Aisa Shaks Bhi To Hua Kare......!!

Muhajir Nama Collection 4


Muhajir hain magar ham ek duniya chor aaye hain,
tmhare paas jitna ha ham utna chor aye hain..!!

 Ab bhi laut jaane ki tamanna sar uthati hai,
ki ham jayas, naseerabad ,takiya chor aaye hain..!!

 Gale me haath daale ghoomte the mukhtalif mazhab
wo kaashi chor aaye hain wo mathura chor aaye hain..!!

 Kaha dhaka ki mammal aur kaha ye khaal se kapde
to kya ham apna shuk e perahan bhi chor aye hain..!!

 Ham uski "jheel aankhon " me kai kankar uchaal aaye
ham uske " phool chehre " par muhasa chor aaye hain..!!

 Hame rota hua wo shaks ab bhi yaad aata hai
jise ham be sabab aur be irada chor aaye hain..!!

 Parindon ki guzarish par bhi hamne kab kadam roke
sada deta hua ham ek papiiha chor aaye hain..!!

 sunhare khawab dekhein bhi to kis tarah dekhein
ki saare neend k mausam to us ja chor aaye hain..!!

 Agar sach-much koi puche to usko kya batayeinge,
ki apni masjidon ko kyu akela chor aaye hain..!!

 Hame apni taharat par hamesha naaz rehta tha,
magar ham dosti ko karke maila chor aaye hain..!!

 Muhajir hain magar ham ek duniya chor aaye hain,
tmhare paas jitna ha ham utna chor aye hain..!!