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Tuesday, 28 January 2014

यक़ीन..!!



एक किसान खेत से अपने घर लौट रहा था. उसने रास्ते में एक गधा देखा.

गधे ने किसान से कहा – “सुनो भाई, मैं कोई साधारण गधा नहीं हूँ. ईसा मसीह का जन्म मेरे सामने ही हुआ था. मैं दो हज़ार सालों से इस दुनिया में हूँ और सिर्फ मैं ही इस बात की गवाही दे सकता हूँ.”

विस्मित और भयभीत, किसान सरपट दौड़कर अपने गाँव के चैपल तक गया और वहां पादरी को सारा किस्सा कह सुनाया.

“असंभव!” – पादरी ने हँसते हुए कहा. तब किसान ने उसे दोबारा से पूरी बाद बताई. गधे के कहे एक-एक शब्द को किसान ने दोहराया.

“मैंने कहा न यह नामुमकिन है! कोई भी पशु मनुष्यों की तरह नहीं बोल सकता” – पादरी ने कहा.

“लेकिन आप सिर्फ एक बार मेरे साथ चलकर उसकी बात सुन लीजिये” – किसान अपनी बात पर अड़ा रहा.

पादरी ने कहा – “भाई मुझे तो तुम ही पूरे गधे लग रहे हो जो एक पढ़े-लिखे पादरी की बात को छोड़कर एक गधे पर यकीन कर रहे हो!”

Tuesday, 20 August 2013

आस्था और विश्वास..!!



पर्वतारोहियों का एक दल एक अजेय पर्वत पर विजय पाने के लिए निकला. उनमें एक अतिउत्साही पर्वतारोही भी था जो यह चाहता था कि पर्वत के शिखर पर विजय पताका फहराने का श्रेय उसे ही मिले. रात्रि के घने अन्धकार में वह अपने तम्बू से चुपके से निकल पड़ा और अकेले ही उसने पर्वत पर चढ़ना आरंभ किया. गहरी काली रात में, जब हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, वह शिखर की ओर बढ़ता रहा. बहुत प्रयास करने के बाद शिखर जब कुछ ही दूर प्रतीत हो रहा था तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगा. उसे अपनी मृत्यु सामने ही दिख रही थी लेकिन उसकी कमर से बंधी रस्सी ने झटके से उसे रोक दिया. घने अन्धकार में उसे नीचे कुछ नहीं दिख रहा था. रस्सी को जकड़कर ऊपर पहुँच पाना संभव नहीं था. बचने की कोई सूरत न पाकर वह चिल्लाया: – ‘हे ईश्वर… मेरी मदद करो!’

तभी अचानक एक गंभीर स्वर कहीं गूँज उठा – “तुम मुझ से क्या चाहते हो?”

पर्वतारोही बोला – “हे ईश्वर! मेरी रक्षा करो!”

“क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ ?

“हाँ ईश्वर! मुझे तुम पर पूरा विश्वास है” – पर्वतारोही बोला.

“ठीक है, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो अपनी कमर से बंधी रस्सी काट दो…..”

यह सुनकर पर्वतारोही का दिल डूबने लगा. कुछ क्षण के लिए वहाँ एक चुप्पी सी छा गई और उस पर्वतारोही ने अपनी पूरी शक्ति से रस्सी को पकड़े रहने का निश्चय कर लिया.

अगले दिन बचाव दल को एक रस्सी के सहारे लटका हुआ पर्वतारोही का ठंड से जमा हुआ शव मिला. उसके हाथ रस्सी को मजबूती से थामे थे और वह धरती से केवल दस फुट की ऊँचाई पर था. यदि उसने रस्सी को छोड़ दिया होता तो वह पर्वतीय ढलान से लुढ़कता हुआ मामूली नुकसान के साथ जीवित बच गया होता.

ईश्वर में सम्पूर्ण आस्था और विश्वास रखना सहज नहीं है. ऐसी दशा में क्या आप अपनी रस्सी छोड़ देते..!!