Sunday, 26 January 2014

सतपुड़ा के घने जंगल..!!



सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।


झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक-दल मे पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनोने, घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताऐं,
डालियों को खींच खाऐं,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाऐं।
सांप सी काली लताऐं
बला की पाली लताऐं
लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात- झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|

अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फ़ूंस डाले
गोंड तगड़े और काले।
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूंज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फ़ैला हुआ सा,
मृत्यु तक मैला हुआ सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फ़ूल, फ़लियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

गुब्बारे वाला..!!



एक आदमी गुब्बारे बेच कर जीवन-यापन करता था.  वह गाँव के आस-पास लगने वाली हाटों में जाता और गुब्बारे बेचता . बच्चों को लुभाने के लिए वह तरह-तरह के गुब्बारे रखता …लाल, पीले ,हरे, नीले…. और जब कभी उसे लगता की बिक्री कम हो रही है वह झट से एक गुब्बारा हवा में छोड़ देता, जिसे उड़ता देखकर बच्चे खुश हो जाते और गुब्बारे खरीदने के लिए पहुँच जाते.

इसी तरह तरह एक दिन वह हाट में गुब्बारे बेच रहा था और बिक्री बढाने के लिए बीच-बीच में गुब्बारे उड़ा रहा था. पास ही खड़ा एक छोटा बच्चा ये सब बड़ी जिज्ञासा के साथ देख रहा था . इस बार जैसे ही गुब्बारे वाले ने एक सफ़ेद गुब्बारा उड़ाया वह तुरंत उसके पास पहुंचा और मासूमियत से बोला, ” अगर आप ये काला वाला गुब्बारा छोड़ेंगे…तो क्या वो भी ऊपर जाएगा ?”

गुब्बारा वाले ने थोड़े अचरज के साथ उसे देखा और बोला, ” हाँ  बिलकुल जाएगा.  बेटे ! गुब्बारे का ऊपर जाना  इस बात पर नहीं निर्भर करता है कि वो किस रंग का है बल्कि इसपर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है ..!!

कहाँ हैं भगवान..!!



एक  आदमी हमेशा  की  तरह  अपने   नाई  की  दूकान  पर  बाल  कटवाने  गया .   बाल  कटाते  वक़्त  अक्सर  देश-दुनिया   की  बातें  हुआ करती थीं  ….आज  भी  वे  सिनेमा , राजनीति ,  और  खेल जगत ,  इत्यादि  के  बारे  में  बात  कर  रहे  थे  कि  अचानक   भगवान्  के  अस्तित्व  को  लेकर  बात  होने  लगी .

नाई  ने  कहा , “ देखिये भैया ,  आपकी  तरह  मैं  भगवान्  के  अस्तित्व  में  यकीन  नहीं  रखता .”

“ तुम  ऐसा  क्यों  कहते  हो ?”, आदमी  ने  पूछा .

“अरे , ये  समझना  बहुत  आसान  है , बस  गली  में  जाइए  और  आप  समझ  जायेंगे  कि  भगवान्   नहीं  है . आप  ही  बताइए  कि  अगर भगवान्  होते  तो  क्या  इतने  लोग  बीमार  होते ?इतने  बच्चे  अनाथ  होते ? अगर  भगवान्  होते  तो  किसी  को  कोई  दर्द  कोई  तकलीफ  नहीं  होती ”, नाई  ने  बोलना  जारी  रखा , “ मैं  ऐसे  भगवान  के  बारे  में  नहीं  सोच  सकता  जो  इन  सब  चीजों  को  होने  दे . आप ही बताइए कहाँ है भगवान ?”

आदमी  एक  क्षण  के  लिए  रुका  , कुछ  सोचा , पर  बहस  बढे  ना  इसलिए  चुप  ही  रहा .

नाई  ने  अपना  काम  ख़तम  किया  और  आदमी  कुछ सोचते हुए  दुकान  से  बाहर  निकला और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया. . कुछ देर इंतज़ार करने के बाद उसे  एक  लम्बी  दाढ़ी – मूछ  वाला  अधेड़  व्यक्ति  उस तरफ आता दिखाई  पड़ा , उसे  देखकर  लगता  था  मानो  वो  कितने  दिनों  से  नहाया-धोया ना   हो .

आदमी  तुरंत  नाई  कि  दुकान  में  वापस  घुस  गया  और  बोला , “ जानते  हो इस दुनिया में नाई नहीं होते !”

“भला  कैसे  नहीं  होते  हैं ?” , नाई  ने  सवाल  किया , “ मैं  साक्षात  तुम्हारे  सामने  हूँ!! ”

“नहीं ” आदमी  ने  कहा , “ वो  नहीं  होते  हैं  वरना  किसी  की  भी  लम्बी  दाढ़ी – मूछ  नहीं  होती  पर  वो देखो सामने उस आदमी की कितनी लम्बी दाढ़ी-मूछ है !!”

“ अरे नहीं भाईसाहब नाई होते हैं लेकिन  बहुत से लोग  हमारे  पास  नहीं  आते .” नाई   बोला

“बिलकुल  सही ” आदमी  ने  नाई  को  रोकते  हुए  कहा ,”  यही  तो  बात  है , भगवान भी  होते हैं पर लोग उनके पास नहीं जाते और ना ही उन्हें खोजने का प्रयास करते हैं, इसीलिए दुनिया में इतना दुःख-दर्द है.”

Tuesday, 21 January 2014

जिंदगी एक ख्वाब..!!



जिंदगी अगर ख्वाब है तो इसमें क्या बुरा है
आखिर ख्वाबो को भी हमने देखा है चलते हुए

वोह जो दूर से दीखता बन, सपना मुस्कुरा कर
आज हकीक़त बन बैठा है, बस रंग बदलते हुए

सपनो के पाव नहीं होते, तो भी चल जाते है
चुटकी बजाते ही बदल जाते है मुक़क्दर सोये हुए

चलना ही फितरत है अगर, तो फिर रुकना कैसा
गिर-गिर कर भी बढ़ जाते है , लोग यूँ संभलते हुए

कयास यह है की जीत होगी या फिर होगी हार
क्यों खेलते हो फिर पाँसे, धडकनों को डूबोये हुए

मैदाने जंग है जिंदगी, यु हकीक़त से क्या शर्माना
किले फतेह कर जाते है कुछ घुटनों पर चलते हुए

शुक्र है कुछ तो है पास तुम्हारे आज देने के लिए,
आशाये चलाती है जिंदगी, गमो को गले लगाते हुए

माना की सफ़र कठिन है और मंजिल भी है दूर
समय बदल ही जायेगा, यु ही करवट बदलते हुए..!!

जो बीत गई सो बात गई..!!



जीवन में एक सितारा था
माना बेहद वो प्यारा था
यह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारें टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छुट गए फिर कहा मिले
पर बोलो टूटे तारो पर
कब अम्बर शोक मनाता हैं
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य न्योछावर तुम
वह सुख गया तो सुख गया
मधुबन की छाती को देखो
सुखी इसकी कितनी कलियाँ
मुरझाई कितनी बल्लारियां
जो मुरझाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलो पर
कब मधुबन शोर मचाता हैं
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिटटी में मिल जाते हैं
जो गिरते है कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालो पर
कब मदिरालय पछताता हैं
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिट्टी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आये हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला हैं
जिसकी ममता घट प्यालो पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता हैं चिल्लाता हैं
जो बीत गई सो बात गई.

अपना घर जमाइये..!!



अपने घर और परिवेश को व्यवस्थित रखना एक हुनर है जो नियमित अभ्यास से और अधिक निखरता है. आधुनिक जीवनशैली मे दिनोंदिन बढ़ती आपाधापी के कारण घर-गृहस्थी में जो समस्याएं पहले महानगरों में आम थीं वे अब छोटे शहरों में में भी पैर पसार रहीं हैं. भारतीय परिवार में घर-परिवार की देखरेख करना स्त्रियों का एक अनुवार्य गुण माना जाता रहा है. बदलते माहौल और जागरुकता के कारण अब बहुत से घरों में पुरुष भी कई कामों में स्त्रियों की सहायता करने लगे हैं. जिन घरों में स्त्री भी नौकरी करती हो वहां या तो नौकर के सहारे या आपसी तालमेल से सभी ज़रूरी काम निपटाना ही समय की मांग है.

रोज़मर्रा के कुछ काम ऐसे होते हैं जिनको करना निहायत ही ज़रूरी होता है. आप चाहें तो कपड़े सप्ताह में एक या दो दिन नियत करके धो सकते हैं लेकिन खाना बनाना और घर को व्यवस्थित रखना ऐसे काम हैं जिन्हें एक दिन के लिए भी टाला नहीं जा सकता. घर की सफाई को टाल देने पर दूसरे दिन और अधिक गंदगी से दो-चार होना पड़ता है. ऐसे में किसी अतिथि के अनायास आ जाने पर शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ता है. इसलिए बेहतर यही रहता है कि सामने दिख रही गंदगी या अव्यवस्था को फौरन दुरुस्त कर दिया जाए.

किसी भी काम को और अधिक अच्छे से करने के लिए यह ज़रूरी होता है कि उसके सभी पक्षों के बारे में अपनी जानकारी को परख लिया जाए. घर के बाहर और भीतर बिखरी अव्यवस्था को दूर करने के लिए रोज़-रोज़ की परेशानियों का सामना करने से बेहतर यह है कि घर को यथासंभव हमेशा ही सुरुचिपूर्ण तरीके से जमाकर रखें. ऐसा करने पर हर दिन की मेहनत से भी बचा जा सकता है और इस काम में खटने से बचने वाले समय का सदुपयोग किन्हीं अन्य कामों में किया जा सकता है.

घर को कायदे से रखने सिर्फ हाउसवाइफ का ही कर्तव्य नहीं है. इस काम में घर के सभी सदस्यों और बच्चों की भागीदारी भी होनी चाहिए. घर के सभी सदस्यों का समझदारी भरा व्यवहार उनके घर को साफ, स्वच्छ और सुंदर बनाता है. घर में कीमती सामान और सजावट का होना ज़रूरी नहीं है बल्कि घर में ज़रूरत के मुताबिक सामान का व्यवस्थित रूप से रखा जाना ही घर को तारीफ़ के काबिल बनाता है. सफाई तथा व्यवस्था को नज़रअंदाज करने और उससे जी चुरानेवाले कई तरह के बहाने बनाते हैं और यथास्थिति बनाए रखने के लिए कई तर्क देते हैं, जिनका समाधान नीचे क्रमवार दिया जा रहा हैः

1. समझ में नहीं आता कि शुरुआत कहां से करूं? - किसी भी काम को करने के लिए कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी, इसलिए यदि आप तय नहीं कर पा रहे हों तो किसी भी एक कोने को चुन लें. उस स्थान को साफ और व्यवस्थित करते हुए आगे बढ़ें. एक ही जगह पर एक घंटा लगा देने में कोई तुक नहीं है. एक कोने को पांच-दस मिनट दें ताकि पूरे घर को घंटे भर के भीतर जमाया जा सके. आज पर्याप्त सफाई कर दें, कल थोड़ी और करें. एक दिन सिर्फ किताबों के ऊपर की धूल झाड़ दें, दूसरे दिन उन्हें क्रमवार जमा दें. यदि आप थोड़ा-थोड़ा करके काम करेंगे तो यह पहाड़ सा प्रतीत नहीं होगा.

2. पुराने अखबारों और पत्रिकाओं में कोई काम की चीज हुई तो? - मेरे एक मित्र के घर दो-तीन साल पुराने अखबारों और पत्रिकाओं का ढेर लगा रहता था. उसे यही लगता था कि उनमें कोई काम की चीज होगी जिसकी ज़रूरत पड़ सकती है. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी अखबार या पत्रिका को खोजने की ज़रूरत पड़ी हो. बहुत लंबे समय तक पड़े रहने के कारण उस रद्दी का सही मोल भी नहीं मिलता था. कुछ घरों में ऐसा ही होता है. यह एक मनोदशा है जिसके कारण लोग पुराने कागजों का अंबार संजोए रहते हैं. इसका सीधा-सरल उपाय यह है कि पढ़ चुकने के फौरन बाद ही यह तय कर लिया जाए कि उस अखबार या पत्रिका को रखना है या रद्दी में बेचना है. जिन अखबार या पत्रिका को सहेजना ज़रूरी लग रहा हो उनका एक अलग ढेर बना लिया जाए. मेरा अनुभव यह कहता है कि यह ढेर भी अंततः रद्दी में ही मर्ज हो जाता है. प्रारंभ से ही ज़रूरी और गैर-ज़रूरी अखबार या पत्रिका का ढेर बनाने लगें ताकि बाद में रद्दी का अंबार न लगे.

3. मैं तो तैयार हूं लेकिन घर के सदस्य ही नहीं मानते! - दूसरों पर जिम्मेदारी डालने से पहले खुद शुरुआत करें. अपनी निजी चीजों को अपनी जगह पर व्यवस्थित रखें और दूसरों को बताएं कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है. नकारात्मक नज़रिया रखते हुए कोई समझाइश देंगे तो इसका सही प्रभाव नहीं पड़ेगा. उन्हें अपने काम में शामिल करें. छोटे बच्चों को बताएं कि वे अपने बस्ते और कपास को सही तरीके से रखें, पेंसिल की छीलन जमीन पर नहीं गिराएं, अपने गंदे टिफिन को धुलने के लिए रखें. अपने परिवेश को साफ रखना व्यक्तिगत अनुशासन का अंग है और छुटपन से ही बच्चों को इसकी शिक्षा देनी चाहिए. प्रारंभ में लोग आनाकानी और अनमने तरीके से काम करते हैं लेकिन उसका लाभ दिखने और प्रोत्साहन मिलने पर यह आदत में शुमार हो जाता है.

4. क्या पता किस चीज की कब ज़रूरत पड़ जाए! - इस मनोदशा का जिक्र ऊपर किया गया है. यदि आप इससे निजात पाने की कोशिश नहीं करेंगे तो आपका घर कचराघर बन जाएगा. इसका सीधा समाधान यह है कि एक बक्सा लें और ऐसे सामान को उसमें डालते जाएं जिसके बारे में आप आश्वस्त नहीं हों. छः महीने या साल भर के बाद उस बक्से का मुआयना करें. यदि इस बीच किसी सामान की ज़रुरत नहीं पड़ी हो तो उससे छुटकारा पाना ही सही है.

5. मैं उपहारों और स्मृतिचिह्नों का क्या करूं? - घर में मौजूद बहुत सी चीजों का भावनात्मक मूल्य होता है और वे किसी लम्हे, व्यक्ति या घटना की यादगार के रूप में रखी जातीं हैं. इन चीजों के बारे में यही कहा जा सकता है कि इनसे जुड़ी असल भावना हमारे भीतर होती है. ये सामान उस भावना का प्रतिरूप बनकर उपस्थित रहते हैं. आप उनकी फोटो लेकर एक अल्बम में या टेबल पर लगा सकते हैं, चाहें तो किसी ब्लॉग आ डायरी में उनके जिक्र कर सकते हैं. यदि ऐसी वस्तुएं जगह घेर रही हों तो उन्हें बक्साबंद करके रख देने में ही समझदारी है. दूसरों ने आपको उपहार इसलिए नहीं दिए थे कि आप उन्हें बोझ समझकर धूल खाने के लिए छोड़ दें. इन उपहारों ने आपको कभी खुशी दी थी, अब इनको रखे रहना मुनासिब न लग रहा हो तो उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखाने में असमंजस न रखें.

6. ऐसी भी क्या पड़ी है? आज नहीं तो कल कर लेंगे! - आलस्य ऐसी बुरी चीज है कि यदि यही भाग जाए तो बहुत से काम सहज बन जाते हैं. एक बात मन में बिठा लें कि कल कभी नहीं आता. आलस्य को दूर भगाने के लिए प्रेरणा या मोटीवेशन खोजिए. आप जिस काम से जी चुरा रहे हों उसका जिक्र परिवार के सदस्यों और दोस्तों से कर दें. उनके बीच घोषणा कर दें कि आपने साफ-सफाई करने बीड़ा उठा लिया है. यदि आप इस दिशा में कुछ काम करें तो उसके बारे में भी सबको बता दें. इसका फायदा यह होगा कि आपको ज़रूरी काम करने के लिए मोटीवेशन मिलता रहेगा और आप कुछ आलस्य कम करेंगे क्योंकि आपके ऊपर खुद से और दुसरों से किए वादे निभाने का दारोमदार होगा. इन वादों को तोड़कर आप खुद को नाकारा तो साबित नहीं होने देना चाहेंगे न?

7. सारी अनुपयोगी वस्तुओं को यूंही तो फेंक नहीं सकते! - यदि आपके घर में बहुत सारा अनुपयोगी सामान है तो उनके निबटारे के केवल तीन संभव हल हैं – अ) सामान चालू हालत में हो तो इस्तेमाल करें. ब) इस्तेमाल नहीं करना चाहते हों या आपके पास उससे अच्छा सामान हो तो किसी और को दे दें. स) यदि सामान खराब हो और ठीक नहीं हो सकता हो तो उसे रखे रहने में तभी कोई तुक है जब उसकी कोई विटेज वैल्यू हो.

8. और भी बहुत से ज़रूरी काम हैं. इनके लिए समय ही कहां है! - यदि आप चाहें तो बहुत से काम संगीत या समाचार सुनते-सुनते ही निबटा सकते हैं. सही तरीके से करें तो अपने घर और परिवेश को साफ और व्यस्थित रखने के लिए रोज कुछ मिनट ही देने पड़ते हैं. एक आलमारी, एक टेबल, घर का एक कोना – एक दिन में एक बार. घर छोड़ने के पहले और घर लौटने के बाद. जिस सामान को जहां रखना नियत किया हो इसे इस्तेमाल के बाद वहीं रखना. जिस चीज की ज़रुरत न हो उसे या तो बक्साबंद करके रख देना या उसकी कंडीशन के मुताबिक या तो ठीक कराकर इस्तेमाल करना, या बेच देना, या दान में दे देना. ये सभी उपाय सीधे और सरल हैं. इन्हें अमल में लाने पर लोग घर की ही नहीं बल्कि उसमें रहनेवाले सभी सदस्यों की भी तारीफ़ करते हैं. यूं तो नौकरों के भरोसे भी यह सब किया जा सकता है लेकिन इसे खुद ही सुरूचिपूर्वक करने में आनंद आता है.

स्व-मूल्यांकन..!!



एक लड़का किराने की दुकान पर गया और उसने सिक्का डालनेवाले फोन से एक नंबर डायल किया. दुकानदार उसे देख रहा था और उसकी बातें भी सुन सकता था.

लड़का – मैम, क्या आप मुझे आपके बगीचे की घास काटने का काम देंगीं?

औरत – (फोन के दूसरी ओर) मेरे पास तो पहले से ही एक लड़का काम कर रहा है.

लड़का – मैमे, लेकिन मैं उससे भी कम पैसे में ये काम करने को तैयार हूं.

औरत – लेकिन जो लड़का मेरे यहां काम करता है मैं उसके काम से खुश हूं.

लड़का – (दृढ़ता से) मैम, मैं आपके दालान और गैरेज को भी साफ कर दूंगा और आपके बगीचे को कॉलोनी का सबसे सुंदर बगीचा बना दूंगा.

औरत – धन्यवाद, लेकिन मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है.

लड़के ने मुस्कुराते हुए फोन का रिसीवर रख दिया. दुकानदार यह सब सुन रहा था, उसने लड़के को अपने पास बुलाया और उसससे कहा.

दुकानदार – मुझे तुम्हारा रवैया बहुत अच्छा लगा. मुझे तुम जैसे काम करनेवाले लड़के की ज़रूरत है. तुम यहां काम करोगे?

लड़का – नहीं, धन्यवाद.

दुकानदार – (हैरत से) लेकिन अभी तुम फोन पर काम पाने के लिए मिन्नतें कर रहे थे!

लड़का – नहीं जी, मैं तो अपने काम के प्रदर्शन का जायज़ा ले रहा था. उस महिला के घर काम करने वाला लड़का मैं ही हूं..!!