Friday, 3 July 2020

बेवजह घर से निकलने की, ज़रूरत क्या है..!!

बेवजह घर से निकलने की,  ज़रूरत क्या है |
मौत से आंख मिलाने  की,  ज़रूरत क्या है ||

सबको मालूम है, बाहर की हवा है क़ातिल |
यूँ ही क़ातिल से उलझने की,   ज़रूरत क्या है ||

दिल बहलने के लिए, घर मे वजह हैं काफी |
यूँ ही गलियों मे भटकने की, ज़रूरत क्या है||

ज़िन्दगी एक नियामत, इसे संभाल के रख |
क़ब्रगाहों को सजाने की ज़रूरत क्या है ||

लोग जब हाथ मिलाते हुए कतराते हों|
ऐसे रिश्तों को निभाने की ज़रूरत क्या है ||

अपनी ही तरह से परेशान है हर कोई..!!

अपनी ही तरह से परेशान है हर कोई;
इस तपती धूंप के लिए कोई दरख़्त नहीं है;

किसी के पास खाने के लिये रोटी नहीं है;
और किसी के पास रोटी खाने का वक़्त नहीं है...!!

Wednesday, 3 June 2020

वो मुझे मेहंदी लगे हाथ दिखा कर रोई..!!

वो मुझे मेहंदी लगे हाथ दिखा कर रोई, 
मैं किसी और की हूँ बस इतना बता के रोई!

शायद उम्र भर की जुदाई का ख्याल आया था उसे, 
वो मुझे पास अपने बैठा के रोई !

कभी कहती थी की मैं न जी पाऊँगी बिन तुम्हारे, 
और आज ये बात दोहरा के रोई!

मुझसे ज्यादा बिछड़ने का ग़म था उसे, 
वक़्त-ए -रुखसत वो मुझे सीने से लगा के रोई!

मैं बेक़सूर हूँ कुदरत का फैसला है ये, 
लिपट कर मुझे बस इतना बता के रोई।

मुझ पर दुःख का पहाड़ एक और टूटा, 
जब मेरे सामने मेरे ख़त जला  के रोई।

मैं तन्हा सा खुद में सिमट के रह गया, 
जब वो पुराने किस्से सुना के रोई।

मेरी नफ़रत और अदावत पिघल गई एक पल में, 
वो वेबफ़ा थी तो क्यों मुझे रुला के रोई।

सब गिले-शिकबे मेरे एक पल में बदल गए, 
झील सी आँखों में जब आँसू लाके रोई।

कैसे उसकी मोहब्बत पर शक़ करूँ मैं, 
भरी महफ़िल में वो मुझे गले लगा के रोई...!!

क्या होता है ये बताएँगे किसी रोज..!!

क्या होता है ये बताएँगे किसी रोज, 
कमाल की ग़ज़ल तुमको सुनाएंगे किसी रोज, 

थी उन की जिद के मैं जाऊं उनको मनाने, 
मुझे ये वहम था कि वो बुलाएँगे किसी रोज, 

मैंने कभी सोचा भी नहीं था ऐसा कि, 
मेरे दिल को वो इतना दुखायेंगे किसी रोज, 

उड़ने दो इन परिंदों को आजाद फिजाओं में, 
गर होंगे तुम्हारे तो लौट के आएंगे किसी रोज..!!

Tuesday, 12 May 2020

उलझनों और कश्मकश में,उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ..!!

उलझनों और कश्मकश में,
उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ।

ए जिंदगी! तेरी हर चाल के लिए,
मैं दो चाल लिए बैठा हूँ |

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नींद आए या ना आए, चिराग बुझा दिया करो,
यूँ रात भर किसी का जलना, हमसे देखा नहीं जाता....!!!

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यहाँ हर किसी को, दरारों में झाकने की आदत है, 
दरवाजे खोल दो, कोई पूछने भी नहीं आएगा....!!!!

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तुझको सोचा तो पता हो गया रुसवाई को
मैंने महफूज़ समझ रखा था तन्हाई को

जिस्म की चाह लकीरों से अदा करता है
ख़ाक समझेगा मुसव्विर तेरी अँगडाई को

अपनी दरियाई पे इतरा न बहुत ऐ दरिया
एक कतरा ही बहुत है तेरी रुसवाई को

चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन
झूठ से हारते देखा नहीं सच्चाई को

साथ मौजों के सभी हो जहाँ बहने वाले
कौन समझेगा समन्दर तेरी गहराई को..!!

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जिसने भी इस ख़बर को सुना सर पकड़ लिया,

कल एक दिये ने आंधी का कॉलर पकड़ लिया..!!

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एक आंसू भी हुकूमत के लिए खतरा है,
तुमने देखा नहीं आँखों का समंदर होना..!!

किसी रोज़ याद न कर पाऊँ तो खुदग़रज़ ना समझलेना दोस्तों..!!

किसी रोज़ याद न कर पाऊँ तो खुदग़रज़ ना समझ
लेना दोस्तों...

दरअसल छोटी सी इस उम्र मैं परेशानियां बहुत
हैं...!!
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न कहा करो हर बार की हम छोड़ देंगे तुमको,
न हम इतने आम हैं, न ये तेरे बस की बात है…!! 

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वफ़ा का नाम सुना था पुराने लोगो से....
हमारे दौर में शायद ये हादसा हुआ नही करता..!!

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चंद रुपयों मैं बिकता हैं यहाँ “इंसान का ज़मीर” कौन कहता हैं मेरे देश मैं महंगाई बहुत हैं..!!

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मैखाने मे आऊंगा मगर पिऊंगा नही साकी;
ये शराब मेरा गम मिटाने की औकात नही रखती..!!

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तुम लौट के आने का तकल्लुफ मत करना;
हम एक मोहब्बत को दो बार नहीं करते..!!

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मोहब्बत-मोहब्बत की बस इतनी कहानी है;
इक टूटी हुई कश्ती और ठहरा हुआ पानी है;
इक फूल जो किताबों में कहीं दम तोड़ चुका है;
कुछ याद नहीं आता किसकी निशानी है..!!

Wednesday, 29 April 2020

कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी..!!

कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी
तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी||