Thursday, 3 December 2020

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया..!!

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया 

जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया 

सूखा पुराना ज़ख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया 

आतीं न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया 

आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नज़रों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया 

अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया

ग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे ज़माने का शुक्रिया 

अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ के जाने का शुक्रिया..!!

Friday, 23 October 2020

मुझसा कोई जहाँ में नादान भी न हो..!!

मुझसा कोई जहाँ में नादान भी न हो...

कर के जो इश्क कहता है नुकसान भी न हो..!!

नामाबर अपना हवाओं को बनाने वाले..!!

नामाबर अपना हवाओं को बनाने वाले,
अब न आएंगे पलट कर कभी जाने वाले

क्या मिलेगा तुझे बिखरे हुए ख्वाबों के सिवा,
रेत पर चांद की तस्वीर बनाने वाले..!!

Wednesday, 9 September 2020

तेरी चुप्पी ग़र…तेरी कोई मज़बूरी है..!!

तेरी चुप्पी ग़र…तेरी कोई
मज़बूरी है….
तो रहने दे…

इश्क़ कौन सा ज़रूरी है..!!

बड़ी सादगी से उसने कह दिया..!!

बड़ी सादगी से उसने कह दिया, रात
को सो भी लिया कर….

रातो को जागने से मोहब्बत लौट नहीं आती..!!

Tuesday, 7 July 2020

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा..!!

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा

काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा

किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा

देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा

और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा..!!

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ..!!

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ

फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया
ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ

मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे
उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ

इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ

फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन
इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ..!!