Sunday, 17 October 2021

कबीर दोहावली भाग 1

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय । 
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥ 

तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय । 
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥ 

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । 
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥ 

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । 
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥ 

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार । 
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥ 

कबिरा माला मनहि की, और संसारी भीख । 
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥ 

सुख में सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद । 
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥ 

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय । 
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥ 

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट । 
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥ 

जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान । 
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥ 

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप । 
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥ 

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । 
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥ 

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और । 
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥ 

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय । 
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥ 

कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान । 
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥ 

शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान । 
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥ 

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर । 
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥ 

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । 
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥ 

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । 
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥ 

नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग । 
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥ 

जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल । 
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥ 

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार । 
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥
 
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर । 
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥ 

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । 
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥ 

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख । 
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥ 

जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग । 
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥ 

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय । 
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥ 

आया था किस काम को, तु सोया चादर तान । 
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥ 

क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह । 
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥ 

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच । 
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥ 

दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय । 
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥ 

दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर । 
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥ 

दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन । 
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥ 

ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय । 
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥ 

हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट । 
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥ 

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार । 
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥ 

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय । 
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥ 

मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय । 
मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥ 

सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप । 
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥ 

अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ । 
मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥ 

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ । 
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥ 

अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट । 
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥ 

कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय । 
ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥ 

पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप । 
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥ 

बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार । 
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥ 

Wednesday, 25 August 2021

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे..!!

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे 

अब भीक मांगने के तरीक़े बदल गए
लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे 

नेज़े पे रखके और मेरा सर बुलंद कर
दुनिया को इक चिराग़ तो जलता दिखाई दे 

दिल में तेरे ख़याल की बनती है एक धनक 
सूरज-सा आइने से गुज़रता दिखाई दे

चल ज़िंदगी की जोत जगाएं, अजब नहीं
लाशों के दरमियां कोई रस्ता दिखाई दे

हर शै मेरे बदन की ज़फ़र क़त्ल हो चुकी
एक दर्द की किरन है कि ज़िंदा दिखाई दे..!!

आज हम उनको बेवफा बताकर आए है..!!

आज हम उनको बेवफा बताकर आए है
उनके खतो को पानी में बहाकर आए है 

कोई निकाल न ले उन्हें पानी से…
इस लिए पानी में भी आग लगा कर आए है..!!

Sunday, 4 July 2021

न मैं कंघी बनाता हूँ न मैं चोटी बनाता हूँ..!!

न मैं कंघी बनाता हूँ न मैं चोटी बनाता हूँ
ग़ज़ल में आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ

ग़ज़ल वह सिन्फ़-ए-नाज़ुक़ है जिसे अपनी रफ़ाक़त से
वो महबूबा बना लेता है मैं बेटी बनाता हूँ

हुकूमत का हर एक इनआम है बंदूकसाज़ी पर
मुझे कैसे मिलेगा मैं तो बैसाखी बनाता हूँ

मेरे आँगन की कलियों को तमन्ना शाहज़ादों की
मगर मेरी मुसीबत है कि मैं बीड़ी बनाता हूँ

सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की
मैं मिट्टी गूँधता था अब डबल रोटी बनाता हूँ

वज़ारत चंद घंटों की महल मीनार से ऊँचा
मैं औरंगज़ेब हूँ अपने लिए खिचड़ी बनाता हूँ

बस इतनी इल्तिजा है तुम इसे गुजरात मत करना
तुम्हें इस मुल्क का मालिक मैं जीते-जी बनाता हूँ

मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ

तुझे ऐ ज़िन्दगी अब क़ैदख़ाने से गुज़रना है
तुझे मैँ इस लिए दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ

मैं अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का क़ातिल भी
जलाकर दूध कुछ लोगों की ख़ातिर घी बनाता हूँ..!!

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में..!!

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में

और जाम टूटेंगे, इस शराबख़ाने में
मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में

हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में

फ़ाख़्ता की मजबूरी ,ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है, उसके आशियाने में

दूसरी कोई लड़की, ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है, उसको भूल जाने में..!!

Saturday, 12 June 2021

मांग लूँ यह मन्नत की फिर यही जहाँ मिले..!!

मांग लूँ यह मन्नत की फिर यही जहाँ 
मिले...
फिर वही गोद , 
फिर वही 'माँ' मिले..!!

हर बार ये इल्ज़ाम रह गया..!!

हर बार ये  इल्ज़ाम रह गया..!
हर काम में कोई  काम रह गया..!

नमाज़ी उठ उठ कर चले गये मस्ज़िदों से..!
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!!