Sunday, 28 September 2014

वो बात बात पे देता है परिंदों की मिसाल..!!

वो बात बात पे देता है परिंदों की मिसाल
साफ़ साफ़ नहीं कहता मेरा शहर ही छोड़ दो
 
तुम्हारी एक निगाह से कतल होते हैं लोग फ़राज़
एक नज़र हम को भी देख लो के तुम बिन ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती
 
अब उसे रोज़ न सोचूँ तो बदन टूटता है फ़राज़
उमर गुजरी है उस की याद का नशा किये हुए
 
एक नफरत ही नहीं दुनिया में दर्द का सबब फ़राज़
मोहब्बत भी सकूँ वालों को बड़ी तकलीफ़ देती है
 
हम अपनी रूह तेरे जिस्म में छोड़ आए फ़राज़
तुझे गले से लगाना तो एक बहाना था
 
माना कि तुम गुफ़्तगू के फन में माहिर हो फ़राज़
वफ़ा के लफ्ज़ पे अटको तो हमें याद कर लेना
 
ज़माने के सवालों को मैं हँस के टाल दूँ फ़राज़
लेकिन नमी आखों की कहती है "मुझे तुम याद आते हो"
 
अपने ही होते हैं जो दिल पे वार करते हैं फ़राज़
वरना गैरों को क्या ख़बर की दिल की जगह कौन सी है
 
तोड़ दिया तस्बी* को इस ख्याल से फ़राज़
क्या गिन गिन के नाम लेना उसका जो बेहिसाब देता है
 
हम से बिछड़ के उस का तकब्बुर* बिखर गया फ़राज़
हर एक से मिल रहा है बड़ी आजज़ी* के साथ..!!

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में..!!

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।

 हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में।

 कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो।

 सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा।

 हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।

 तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।

 मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता, तो हाथ भी न मिला।

 पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,
आंखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।

 परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता

 उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए..!!

कैसे-कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं..!!

 कैसे-कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं,
अपने-अपने ग़म के फ़साने हमें सुनाने आ जाते हैं।

मेरे लिए ये ग़ैर हैं और मैं इनके लिए बेगाना हूँ
फिर एक रस्म-ए-जहाँ है जिसे निभाने आ जाते हैं।

इनसे अलग मैं रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में
मेरी ये मजबूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं।

सबकी सुनकर चुप रहते हैं, दिल की बात नहीं कहते
आते-आते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं..!!

रजाई..!!

बेटा मैं तुझे कितनी बार कह चुकी हूँ कि छत पर जो चारपाई पड़ी है उस पर यह रजाई सूखने के लिये डाल आ, पर तू तो एक कान से सुनता है दूसरे से निकाल देता है।

माँ इस रजाई को ऊपर डालने की बात तो दूर मैं इसे छुऊँगा भी नहीं। माँ इसे तू बाहर क्यों नहीं फेंक देती। बाढ़ के गंदे पानी में भीगी इस सड़ी हुई रजाई को भला कौन ओढ़ेगा? बाढ़ का गंदा पानी पूरा दिन घर में रहा, कितनी बदबू हो गई थी, यहाँ तक कि घर में खड़ा होना भी मुश्किल  हो रहा था।
देख बेटा दू इसे ऊपर धूप मे सूखने डाल आ। एक बर सूख जाएगी तो तो मैं इसका अस्तर उधेड़कर तथा रूई धुनवाकर फिर से भरवा लूँगी।
माँ मैंने कह दिया, मैं इसे नहीं उठाऊँगा, न ही तुम्हें इसे दोबारा भरवाने दूँगी। उसने एक एक शब्द चबा कर अपनी माँ की गोद में डाल दिया।
दूसरे कमरे में बैठे उसके पिता सभी कुछ सुन रहे थे। वह उठकर उसी कमरे में चले आए जहाँ माँ तथा बेटे  वार्तालाप हो रही था। वे भी बेटे आग्र ह पूर्वक बोले, देख बेटा, ठीक है इसे नये सिरे से मत भरने दना। इसे सुखाकर किसी जरूरतमंद को तो दिया जा सकता है। कितने लोग सर्दियों में फुटपाथ पर ठंड से सिकुड़ रहे होते हैं जिसे भी मिलेगी वह दुआएँ तो देगा।
चलो पापा मैं इसे ऊपर सूखने डाल भी आता हूँ, यह सूख भी जाएगी। परन्तु इसे उठाकर फुटपाथ पर सोने वालों को कौन देने जाएगा। क्या यह गंदी रजाई उठाकर आप जाएँगे या मम्मी जाएँगी?
एक अजगर सा प्रश्न बेटे ने अपने माता पिता के सामने डाल दिया था जो काफी देर तक कमरे में मुँह बाए पसरा रहा। और कमरे में नीरवता छाई रही। अंततः उस चुप्पी को पापा ने ही तोड़ा, बेटा, मान लो इसे फुटपाथ पर सोने वालों को भी नही दिया जाता तो इसका निपटान कैसे होगा। इसे घर के बाहर भी तो नहीं फेंका जा सकता। इसका एक और हल हो सकता है कि इसे कल कूड़ेवाले से ही उठवा दिया जाए।
इस पर उनकी पत्नी आक्रोश जताते हुए बोली, वह इस महँगे अस्तर वाली रजाई को ऐसे ही कूड़े में नहीं फेंकना चाहती।
यह सुनते ही बेटा तुनक कर बोला, तो माँ तू ही जाने, मुझे इसे उठाने के लिये न कहना। इतना कह कर वह दूसरे कमरे में चला गया।
जब की हल निकलता नजर नहीं आया तो वह पत्नी को ओर देखर बोले, देखो मैं तुम्हें ऐसे अस्तर की एक और रजाई बनवा दूँगा। रही इस रजाई की बात, इसे मैं शाम को ढेहा बस्ती के पास जो नाला है उसके किनारे रख आऊँगा। इतना कहकर वे उठे और रजी को लेकर छत पर धूप में जाल आए। शाम को अँधेरा होते ही वह उस रजाई को नाले के पास छोड़ आए।
अभी वे धीमे धीमे कदमों से घर की ओर लौट रहे थे कि उन्होंने उस बुढिया को उसी रजाई को उठाए वहाँ से गुजरते हुए देखा। वह अपने मुँह में कुछ न कुछ बड़बड़ाती जा रही थी। कुछ टूटे फूटे शब्द उनके कान में भी पड़े- पिछला जाड़ा तो बोरी को ओढ़कर ही काटा था, इस बार तो तूने सुन ली और एक अच्छी सजाई भेज दी। सचमुच भगवान तू कितना दयालू है।

याद..!!

रेन में घुसते ही आज नोना को पता नहीं क्या हुआ, तेज तेज रोना शुरू कर दिया !

दो साल की बच्ची को समझाएँ भी तो कैसे ? माँ ने बहुत कोशिश की उसे सुलाने की पर पता नहीं आज क्या बात थी कि वह पिता की गोदी छोड़ने को तैयार नहीं! माँ गोद में लेकर बैठे तो फिर और तेज रोना शुरू! और माँ ट्रेन की गैलरी में टहले वह कुछ सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं था।

आखिरकार पिता ने बेटी को कंधे से लगाया और थपकी देते हुए टहलना शुरू किया ! हल्का सा गुनगुनाने लगे ! यात्री मंद मंद मुस्कुरा रहे थे, महिलाएँ कुछ भावुक हो उठीं! नोना थोड़ी देर बाद चुप हो गई, धीरे से पिता के कंधे पर सिर टिका दिया, आँखें रुक रुक कर बंद कीं और थोड़ी ही देर में मीठे सपनो में खो गयी !

आश्वस्त माँ, पिता की गोद से बच्ची को लेने के लिये उठी तो पिता की आँखे भीगी हुई थी !
माँ ने बच्ची को लेकर सीने से सटाया और पति की आँखों में आँखे डालकर शरारत से पूछा !
"बेटी पर इतना प्यार आया कि मोती बरस पड़े?"
"नहीं, बस, आज पता नहीं क्यों बाबूजी याद आ गए।"

मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते..!!

मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते?
हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते?

ये रात, ये तनहाई, ये सुनसान दरीचे
चुपके से मुझे आके सदा क्यों नहीं देते।

है जान से प्यारा मुझे ये दर्द-ए-मोहब्बत
कब मैंने कहा तुमसे दवा क्यों नहीं देते।

गर अपना समझते हो तो फिर दिल में जगह दो
हूँ ग़ैर तो महफ़िल से उठा क्यों नहीं देते..!!

ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे..!!

ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।

अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ,
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।

कितने नादाँ हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।

मंज़िलें दूर भी हैं, मंज़िलें नज़दीक भी हैं,
अपने ही पाँवों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे।

आज दिल खोल के रोए हैं तो यों खुश हैं ‘फ़राज़’
चंद लमहों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे..!!