Sunday, 6 March 2022

सच के रास्ते पे चलने का.. ये फ़ायदा हुआ..!!

सच के रास्ते पे चलने का.. ये फ़ायदा हुआ, 

रास्ते में कहीं भीड़ नहीं थी..!!

जाते जाते उसने पलटकर सिर्फ इतना कहा मुझसे..!!

जाते जाते उसने पलटकर सिर्फ इतना कहा मुझसे, 

मेरी बेवफायी से ही मर जाओगे या मार के जाऊ..!!

Sunday, 16 January 2022

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है..!!

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है। 

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके
जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है..!!

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

Sunday, 19 December 2021

रश्मिरथी - तृतीय सर्ग - भाग 2

वसुधा का नेता कौन हुआ?

भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?

नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया,

विघ्नों में रहकर नाम किया।
जब विघ्न सामने आते हैं,

सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,

तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही,

जाते हैं हमें जगाकर ही।
वाटिका और वन एक नहीं,

आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,

पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।
वन में प्रसून तो खिलते हैं,

बागों में शाल न मिलते हैं।
कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,

छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,

लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,

वे ही शूरमा निकलते हैं।
बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,

मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,

तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,

क्या कर सकती चिनगारी है?
वर्षों तक वन में घूम-घूम,

बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,

पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,

देखें, आगे क्या होता है।

रश्मिरथी - तृतीय सर्ग - भाग 1

हो गया पूर्ण अज्ञात वास,

पाडंव लौटे वन से सहास,
पावक में कनक-सदृश तप कर,

वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,
नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,

कुछ और नया उत्साह लिये।
सच है, विपत्ति जब आती है,

कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,

क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,

काँटों में राह बनाते हैं।
मुख से न कभी उफ कहते हैं,

संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,

उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,

बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।
है कौन विघ्न ऐसा जग में,

टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,

पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,

पत्थर पानी बन जाता है।
गुण बड़े एक से एक प्रखर,

हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,

वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है

रोशनी नहीं वह पाता है।
पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,

झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,

बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,

हम उनको गले लगाते हैं।

Sunday, 17 October 2021

कबीर दोहावली भाग 2

हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध । 
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥ 

राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस । 
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥ 

जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच । 
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥ 

तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार । 
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥ 

सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन । 
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥ 

समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय । 
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥ 

हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय । 
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ 52 ॥ 

कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय । 
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥ 53 ॥ 

वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल । 
बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥ 54 ॥ 

कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय । 
चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय ॥ 55 ॥ 

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय । 
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ 56 ॥ 

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय । 
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥ 57 ॥ 

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय । 
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥ 58 ॥ 

लागी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय । 
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ 59 ॥ 

भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय । 
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥ 60 ॥ 

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार । 
बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार ॥ 61 ॥ 

अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार । 
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥ 62 ॥ 

मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार । 
तुम दाता दु:ख भंजना, मेंरी करो सम्हार ॥ 63 ॥ 

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय । 
राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ 64 ॥ 

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय । 
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥ 65 ॥ 

सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग । 
कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ 66 ॥ 

सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल । 
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ 67 ॥ 

छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार । 
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ 68 ॥ 

ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग । 
तेरा सांई तुझमें, बस जाग सके तो जाग ॥ 69 ॥ 

जा करण जग ढ़ूँढ़िया, सो तो घट ही मांहि । 
परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं ॥ 70 ॥ 

जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश । 
मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास ॥ 71 ॥ 

नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय । 
कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥ 72 ॥ 

आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद । 
नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद ॥ 73 ॥ 

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय । 
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावें सोय ॥ 74 ॥ 

जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम । 
माता प्यारा बारका, भगति प्यारा नाम ॥ 75 ॥ 

दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी । 
कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥ 76 ॥ 

बानी से पह्चानिये, साम चोर की घात । 
अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात ॥ 77 ॥ 

जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव । 
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव ॥ 78 ॥ 

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त । 
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥ 79 ॥ 

दाया भाव ह्र्दय नहीं, ज्ञान थके बेहद । 
ते नर नरक ही जायेंगे, सुनि-सुनि साखी शब्द ॥ 80 ॥ 

दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय । 
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ॥ 81 ॥ 

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय । 
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ॥ 82 ॥ 

छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय । 
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय ॥ 83 ॥ 

जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम । 
दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम ॥ 84 ॥ 

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय । 
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ॥ 85 ॥ 

ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय । 
नीचा हो सो भरिए पिए, ऊँचा प्यासा जाय ॥ 86 ॥ 

सबते लघुताई भली, लघुता ते सब होय । 
जौसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय ॥ 87 ॥ 

संत ही में सत बांटई, रोटी में ते टूक । 
कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक ॥ 88 ॥ 

मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहि दोष । 
यह कबिरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष ॥ 89 ॥ 

जब ही नाम ह्रदय धरयो, भयो पाप का नाश । 
मानो चिनगी अग्नि की, परि पुरानी घास ॥ 90 ॥ 

काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय । 
काया वैध ईश बस, मर्म न काहू पाय ॥ 91 ॥ 

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह । 
शब्द बिना साधु नही, द्रव्य बिना नहीं शाह ॥ 92 ॥