Wednesday, 19 November 2014

तनाव..!!

साल में एक बार छोटा आता ही है परिवार सहित। और जब भी छोटा आता है बड़े के दिमाग में एक तनाव बना रहता है। ये तनाव तब तक बना रहता है जब तक छोटा इस घर में रहता है। यह बात वह किसी से कहता नहीं, किसी को मालूम भी नहीं होने देता, अपनी पत्नी को भी नहीं।
ये तनाव क्यों होता है जानता है वह।
जैसे ही फोन पर कबर मिलती है कि छोटा आ रहा , तब घर का नक्शा ही बदल जाता है। पूरे घर की साफ-सफाई होती है सोफे के कवर और खिड़कियाँ, दरवाजे के पर्दे बदल दिये जाते हैं। ये सब माँ ही करती है। उसकी समझ में नहीं आता कि क्यों? बैंक में मैनेजर है छोटा। ऊँची पोस्ट पर है। ऊँची सोसायटी में उठता बैठता है, शायद इसी वजह से। छोटा चाय नहीं, काफी पीता है। बच्चे हार्लिक्स पीते हैं। खाने पीने पर खास ध्यान दिया जाता है। माँ उसके ही बच्चों में खोई रहती है।
इस बीच वह यह भी महसूस करता है कि जब तक छोटा इस घर में रहता है उसका महत्त्व कम हो जाता है। किसी भी बात के लिये उससे सलाह नहीं ली जाती, नही उससे कुछ पूछा जाता है। पिताजी बैठे बैठे छोटे से ही बतियाते रहते हैं। यदि वह वहाँ पहुँच जाए तो चुप हो जाते हैं। बस, यही कारण है उसके तनाव का, वह महसूस करता है।
मोटर साइकिल स्टैंड पर खड़ी करते हुए उसने देखा कि छोटा और पिताजी ड्राइंग रूम में बैठे हुए बातें कर रह हैं। सामने टीवी चल रहा है। माँ उठकर दरवाजे पर आ गयी। माँ ने पूछा, "आज बहुत देर कर दी, कहाँ था?
"कहीं नहीं, यहीं ऐसे ही।" कहता हुआ वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। वह साफ झूठ बोल गया। तनाव की वजह से वह पिक्चर हाल में जाकर बैठ गया था। पिक्चर छूटने के बाद भी वह इधर-उधर घूमता रहाष रात के पूरे ग्यारह बजे तक।
वह कमरे में घुसा। बच्चे सो चुके थे। उसकी पत्नी पलंग पर लेटी हुई कोई मैगजीन पढ़ रही थी। कपड़े उतार कर वह बाथरूम में फ्रेश होने चला गया। वहाँ से आया तो तौलिये से हाथ मुँह पोंछते हुए पत्नी से बोला, "खाना लगा दो... बहुत भूख लगी है।"
"
अकेले ही खाओगे?" पलंग से उठती हुई पत्नी बोली।
"क्यों"?
"पिताजी और भाई साहब भी बिना खाना खाए बैठे हैं अभी तक... उन्होंने भी खाना नहीं खाया है। कब से तुम्हारी राह देख रहे हैं।" पत्नी ने कहा।
"अरे, उन्हें खा लेना चाहिये था।"
कभी तुम्हारे बगैर खाया है उन्होंने सब एक साथ ही तो खाते हैं। पत्नी ने कहा और खाना लगाने चली गई।

वह ठगा सा खड़ा रह गया उसका गहरा तनाव बर्फ बनकर पिघल गया।
खाना खाने के बाद वह पूरी तरह तनावमुक्त था।

Tuesday, 18 November 2014

बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है..!!

बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज़ भेष बदल कर मेरी तलाश में है।

मैं एक कतरा हूं मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है ।

मैं देवता की तरह कैद अपने मन्दिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है।

जिसके हाथ में एक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है..!!

ग़मों ने बाँट लिया मुझको ख़ज़ाने की तरह..!!

ग़मों ने बाँट लिया मुझको ख़ज़ाने की तरह
बिखर गया हूँ हर गली में फ़साने की तरह,

मुझे कुछ इस तरह से ढ़ूँढ़ रही है गर्दिश
के जैसे मै हूँ शिकारी के निशाने की तरह,

के रात रात न हो, कोई चिता हो जैसे
के जैसे ख़्वाब हों जलने के बहाने की तरह,

मै कोई संग न था मै तो एक शीशा था
पटक दिया मुझे पत्थर पे ज़माने की तरह,

ये वहम ये ख़लिश ये वफ़ा-मिजाज़ ज़ेहन
इन्होने कर दिया मुझको दीवाने की तरह..!!

कहने को कह गए कई बात ख़ामोशी से..!!

कहने को कह गए कई बात ख़ामोशी से
कटते-कटते कट ही गई रात ख़ामोशी से,

न शोर-ए-हवा, न आवाज़-ए-बर्क़ कोई
निगाहों में अपनी हर दिन बरसात ख़ामोशी से,

शायद तुम्हें ख़बर न हो लेकिन यूँ भी
बयाँ होते हैं कई जज्बात ख़ामोशी से,

दिल की दुनिया भी कितनी ख़ामोश दुनिया है
किसी शाम हो गई इक वारदात ख़ामोशी से,

माईले-सफर हूँ, बुझा-बुझा तन्हा-तन्हा
पहलू में लिए दर्द की कायनात ख़ामोशी से,

मुट्ठी में रेत उठाये चला था जैसे मैं
आहिस्ता-आहिस्ता सरकती गई हयात ख़ामोशी से,

मिटा मिटा कर तेरी तस्वीरें बनाईं है मैंने..!!

अक्सर वो ही बातें बा_रहां दोहराईं हैं मैंने
मिटा मिटा कर तेरी तस्वीरें बनाईं है मैंने,

जिस हंसीं फरेब से ता_उम्र तौबा किया था
फिर वो ही गज़लें आज महफिल मे गाईं हैं मैंने,

मेरी आँखों के अब कोई सागर ना लुटे
बहुत टूट हूँ तब ये नदियाँ बहाईं है मैंने,

मेरी आदत में नही था यारों दर्द रोना
बहुत बेबस में ये मजबूरियाँ सुनाई है,

मैंने मुद्दतों बाद फिर हँसते देखा है उनको
उनकी तकलीफें आज ख़ुदा को बातईं है मैंने,

फिर जीने की दिल को हसरत सी हुई है
एक बार फिर कमजोरियाँ जताईं है मैंने..!!

विवशता..!!

कॉलेज छोड़ने के बाद यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। मित्र को न जाने कैसे पता चल गया कि मैं इस कॉलोनी में हूँ। कमरे में बैठते ही मैंने आवाज़ लगाई, ''सुनीता! देख, आज कौन आया है?''
पत्नी संभवतः घर पर नहीं थी। उत्तर नहीं मिला। इतने में मेरी पाँच वर्षीय लाड़ला आ धमका और पैरों से लिपटते हुए बोला, ''पापा! पापा! मम्मी गुप्ता आंटी के घर गई हैं।''

रोज़ का हाल है यह! किसी न किसी चीज़ के लिए पत्नी को पड़ोस में भागना पड़ता है। माह के आखिरी दिन थे। मित्र के अकस्मात आगमन से मैं मुश्किल में फँस गया था।
मित्र ने ध्यान भंग किया, ''और कितने बच्चे हैं... राजेश?''
''दो ओर हैं- एक लड़का... एक लड़की, दोनों स्कूल गए हैं!'' मैंने बरबस मुस्कराने का यत्न किया।
''अब और नहीं होने चाहिए।'' मित्र की फीकी हँसी बड़ी देर तक कमरे में लटकी रही।
समय निकलता जा रहा था और अभी तक हम चाय नहीं पी पाए थे। पत्नी की अनुपस्थिति खलने लगी। ''शायद, पत्नी स्कूल चली गई- बच्चों को लेने। आज हाफ डे है न!''
मैंने अपनी कमज़ोरी छिपाई। सच्ची-झूठी बातें कब तक झेलता। मैंने बबूल से कहा, ''बेटा! ज़रा देख तो आ मम्मी को। कहीं बिहारिन आँटी के घर न हों। अभी तक तो हम दो बार चाय पी चुके होते।''
''छोड़ भी यार। जब से बैठा हूँ। चाय की रट लगा रखी है। मैं हर पंद्रहवें दिन दिल्ली आता हूँ, फिर कभी पी लेंगे चाय... भाभी के हाथ की। मुझे चलने दे अब!'' यह कहकर मित्र उठ खड़ा हुआ।
मैंने रोकना चाहा पर वह नहीं माना और बबलू को दस का नोट थमाकर बाहर निकल आया। मैंने बबलू को खींचकर झट से अंदर किया और उसे समझाया, ''तुम यहीं रहना। मम्मी से कहना पापा बाज़ार गए हैं।''
बबलू सिर खुजलाता रह गया।
अब हम दोनों सड़क नाप रहे थे। मैंने कहा, ''यार! इतने दिनों बाद मिले और एक कप चाय भी न पिला पाया। घर न सही चलो किसी दुकान में बैठकर पी लेते हैं।''
हम दोनों एक ढाबे में बैठ गए। चाय के सा समोसे भी मँगा लिए थे। चाय पी चुकने के बाद मैंने कुछ हल्कापन महसूस किया। मैंने बड़े रोब में दुकानदार को पैसे बढ़ाए! यह क्या... मेरा हाथ काँप रहा था। दुकानदार बोला, ''बाबू जी! आज इतनी सर्दी नहीं है... फिर भी...।''
मेरे हाथ में बबलू को दिया गया मित्र का वह दस रुपए का नोट फड़फड़ा रहा था। शायद मित्र न समझ पाया हो। फिर भी मेरा हाथ बड़ी देर तक काँपता रहा।

बेबस विद्रोह..!!

उस दिन तो अजब हो गया। पलभर में हंगामा खड़ा हो गया। सुशीला अवाक खड़ी चुपचाप पार्वती का मुँह देख रही थी। कच्छा भीड़े हुए वह घायल शेरनी की तरह दहाड़ रही थी।
``मालकिन हम गरीब हैं। आपके घर में झाड़ू-बुहारू करते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारी कोई इज़्ज़त-विज़्ज़त नहीं है। आप लोगों को जब जो जी चाहे बोल लीजिए।'' बोलते-बोलते वह हाँफने लगी थी।
हाथ में पकड़े झाड़ू को उसने फेंक दिया और मालकिन की तरफ़ आँखें फाड़कर देखने लगी।
''अरे पार्वती क्या हुआ शांत हो जा। आखिर मैं भी तो सुनूँ बात क्या है? ऐसा क्या हुआ कि तूने सारा घर सर पर उठा लिया?'' पार्वती को शांत करती हुई सुशीला ने पूछा।
मालकिन की प्यार भरी बातों ने पार्वती को भीतर तक भींगो दिया। उसकी आँखें छलछला आईं। स्नेह पाकर उसके सब्र का बाँध टूट पड़ा। सुबकते हुए उसने कहा, ''मालकिन! अब मुझसे ई धर में काम नहीं होगा। जहाँ आदमी की इज़्ज़त न हो, वहाँ तो पल भर भी नहीं रुकना चाहिए। मालकिन! आप मेरा हिसाब कर दें। मैं दूसरी जगह चली जाऊँगी।''
''कर ले अपना हिसाब-किताब और फूट यहाँ से। नहीं तो...'' यह सुशीला की बहू की आवाज़ थी।
''नहीं तो, क्या कर लेंगीं आप? बोलिए न बीबी जी! मैं मुफ़्त के पैसे नहीं लेती। हाड़ तोड़ती हूँ तो पैसे लेती हूँ। फिर धौंस किस बात की?''
''अरी पार्वती! तू बहू की बातों पर न जा! उसने अभी दुनियादारी कहाँ देखी है। और तू बता, तू तो मुझे माँ जैसा आदर देती है। मैं भी तुझे बेटी की तरह मानती हूँ। तू बता, अगर तू सचमुच मेरी बेटी होती, तो क्या बहू के इतना कहने पर मुझे छोड़कर चली जाती?'' डबडबाई आँखों से सुशीला ने पार्वती को देखते हुए कहा।
सुशीला की डबडबाई आँखों को देखकर पार्वती के मन का गुस्सा ख़त्म हो गया था। उसने कुछ कहा नहीं। वह चुपचाप उठी और अपने को काम में लगा दिया।